बुधवार, 23 जनवरी 2013

खुशबू


तुम तो यहीं थी 
मेरे भीतर
एक खुशबू की तरह 

मुझे महकाती हुयी 
और मैं पागल 

ढूँढता रहा तुम्हें बाहर 
कस्तूरी मृग की तरह 


पर तुम चुप क्यूँ रही?

कुछ तो कहती

डांट ही देती मुझे
मेरी मूर्खता पर
या आनंद आता है
मुझे सताने मे 
यही बता दो अब



क्या मेरे कष्ट

मेरे दुख देख 

तुम्हें पीड़ा न हुयी
नहीं लगा तुम्हें 
प्रेम की खुशबू 
काफी नहीं है 
सहारा चाहिए था मुझे?



नहीं लगा यदि 

ऐसा कुछ तुमको 

तो फिर अब मुझमे 
बस कर नहीं कोई लाभ
छोड़ दो मुझे 
मेरे हाल पर
ले लो अपनी खुशबू 
मुझे महकने दो अब 
मेरी तरह


...........

1 टिप्पणी:

लोकप्रिय पोस्ट