बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कहानी : "रेत"

                उसके यूँ तो छमिया, छम्मकछल्लो, हरामजादी, रानी वगैरह कई नाम थे, मगर मुझे उसके नाम में कभी दिलचस्पी नहीं रही ...वो हर बार कुछ और बन जाती थी मेरे लिए.....और मैं इसीलिए उसके पास जाता था
वो मेरे लिए समंदर किनारे की रेत थी जब तक दिल किया उसके साथ खेला....... कुछ भी अपने मन का गढ़ा और फिर लात मार कर चल दिया
समंदर किनारे की रेत केवल दिल बहलाने के लिए होती है उसे कोई घर में नहीं सजाता और जब दिल बहल जाए तो हाथ झाड कर निकल जाते हैं....
मुझे उसके कौन सी बात पसंद थी या कौन सी बात नापसंद थी ये कहना मुश्किल है
कभी ध्यान नहीं दिया.....बस एक ही बात थी जो बहुत अजीब लगती थी.....अच्छी या बुरी में तौलने की कोशिश न करिए......बस अजीब....और वो ये की वो सीधे आँखों में देखती थी......एक टक...... बिना पलक झपकाए ........घूर कर नहीं.......बस यूँ की मुझमे कुछ खोज रही हो......या अपनी आँखों में मुझे कुछ दिखाने की कोशिश कर रही हो .....मुझमें उसे क्या दिखा क्या मिला मैंने कभी पुछा नहीं उसने कभी बताया नहीं
लेकिन मैंने कई बार उसकी आँख में अपना अक्स देखा है.....उसमे मैं अच्छा नहीं दिखा कभी.......हलाकि मेरे घर का आईना मुझे हमेशा खूबसूरत बताता है...लेकिन नहीं हमेशा कुछ काला सा दीखता था 

पर ये कहानी मेरी नहीं उसकी है....उसकी जिसका नाम मुझे नहीं पता.....
हर कहानी शुरू से शुरू होती है मगर उसकी कहानी की शुरुआत कब कहाँ कैसे और क्यूँ हुयी कोई नहीं जानता, वो बाज़ार में कब लायी गयी और कितनी बार बिकी किसी ने इसका हिसाब रखने की ज़रुरत नहीं समझी...... उसने खुद ने भी नहीं । मेरे लिए उसकी कहानी तब शुरू हुयी जब मैं उससे पहली बार मिला या यूँ कहूं की जब मैंने उसे पहली बार खरीदा या उसके शब्दों में मैंने पहली बार उसे भाड़े पे लिया ।
दलाल को बाहर पैसे देकर मैं कोठा नंबर 27 में दाखिल हुआ.....कोठे की जो इमेज दिमाग मे थी उससे काफी अलग थी वो जगह.......इस दस बाई दस कमरे की दीवरों पर हल्का हरा रंग लगाया गया था जो सीलन से कुछ हिस्सों में पपड़ी छोड़ रहा था......दरवाज़े से बिलकुल बगल एक मेज़ पर कुछ मेकप का सामान करीने से रखा था......उसके ठीक ऊपर दीवार पर एक छोटा आइना था....सामने दीवार पर दो तस्व्वेरें थी जिनमें किसी नेचुरल लैंडस्केप के ऊपर कोई अंग्रेजी सूक्ति लिखी थी......दाई और की दीवार पर एक खिड़की थी जो शायद ही कभी खुली थी......कमरे में घडी नहीं दिखी......बाहर दलाल लेकिन समय के हिसाब से पैसे ले रहा था........बिज़नस टैक्टिक्स!!......बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था....जो हलके कपडे के परदे से ढँक हुआ था.....मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ती या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी.....छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था.......पंखे से ठीक नीछे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी......चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे....
उसी चादर पर बैठी थी वो ......गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में.....मुस्कुराती हुयी
"आओ साहब.......क्या लोगे??"
यूँ तो ये सवाल काफी सीधा था मगर इसके जवाब कई हो सकते थे.......इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में बिताये हुए दो साल इतना तो सिखा चुके थे की हर बात कई मतलब लिए होती है और एक गलत जवाब आपका मजाक बना सकता था
"यहाँ लोग क्या लेने आते है"
"वो तो लेने वाले पे डिपेंड करता है.....मेरी तो भाड़े पर देने की दूकान है जो चाहो मिल जाएगा.....यहाँ कोई अपनी बीवी लेने आता है तो कोई माशूका किसी को फिल्मी हिरोइने चाहिए तो कोई रंडी की तलाश में यहाँ आता है तुम्हे क्या चाहिए भाड़े पे???
"एक रंडी के मुंह से इतनी फिलासफी अच्छी नहीं लगती"
"ह्म्म्म.....तो तुम्हे केवल रंडी चाहिए.....हाज़िर है"
उसके बाद उसने एक शब्द नहीं कहा......अब वो रेत मेरी थी.....अब मैं उसका क्या करूँ मेरी मर्ज़ी थी.... 
मैंने जी भर खेल कर वो रेत उसी बिस्तर पर बिखेर दी । 
धीरे धीरे मैं उसका नियमित ग्राहक बनता गया । सेक्स में ये अजीब सा गुण है आप जितना उसमे डूबते हो वो उतना ही और अन्दर खींचता है । पहले महीने में फिर दस दिन में और फिर हफ्ते में दो तीन बार मुझे उसकी ज़रुरत पड़ने लगी । अब हम थोड़ी बहुत बातें भी कर लेते थे। ज्यादातर वो बातें मेरे कालेज के बारे में होती थी । उसे उनमे काफी दिलचस्पी लगती थी। 

पिछले सात महीने में उसने केवल एक बार मुझे वापस लौटाने की कोशिश की थी । उस दिन वो काफी थकी लग रही थी। लेकिन दलाल ने उसे जबरदस्ती तैयार कर लिया । उस दिन पहली बार मुझे लगा की वो जिंदा है..... उस दिन शायद उसे भी पहली बार लगा की मैं इंसान हूँ । हमने कुछ किया नहीं उस रात। केवल बातें की

"तू ये सब पढ़ के कितना कम लेगा रोज़?"
"रोज़ नहीं ...महीने के मिलेंगे....कम से कम 25 30 हज़ार"
"कितने घंटे काम करना होगा"
"10 घंटे ....कभी कभी ज्यादा भी हो सकता है"
"कितने साल तक??"
"जब तक मैं चाहूँ....50 का होने तक तो कर ही सकता हु"
"साला तुम लोग अच्छे रंडी हो......हम लोग का तो 35 के बाद ख़तम."
"मैं इंजिनियर हु....."
"कौन सा रंडी से कम हो.....हम तो केवल शरीर बेचते हैं.....तुम तो दिमाग भी बेंच दोगे...... लेकिन दाम अच्छा मिलता है तुमको।"
मेरे पास उसका जवाब नहीं था.....था भी तो मैं दे नहीं पाया जाने क्यों??
"जानता है मुझे बचपन का कुछ याद नहीं.....माँ बाप भाई बहन कुछ नहीं । बस एक ही बात याद आती है । मुझे दुल्हन बनना बहुत अच्छा लगता था । सज धज के अपने आदमी का इंतज़ार करना । और किस्मत देख आज मैं रोज दुल्हन बनती हूँ..... रोज आदमी का इंतज़ार करती हूँ । फर्क बस इतना है मेरा आदमी बदल जाता है । "
कुछ देर रूककर उसने खुद को आईने में देखा और हसने लगी 
"कितनी खुशकिस्मत हूँ मैं" 
मैंने दो तीन पानी की बूँदें महसूस की थी उसी समय अपने हाथ पर। 
पता नहीं वो उसके आँख के थे या मेरी आँख के या शायद छत टपक रही थी 
उस रात उसने और भी बहुत कुछ कहा था पर मैंने कुछ सुना नहीं....मैं उन दो बूंदों की गुत्थी में ही उलझ के रह गया ।
उस रात के बाद हमारा रिश्ता कुछ बदल गया । ये प्यार नहीं था........दोस्ती या सहानुभूति जैसा भी नहीं था । जाने क्या था वो। बस एक रिश्ता था ।
अब मैं वहां रोज़ जाता था। वो अब भी दुकानदार थी और मैं खरीददार बस हममें अब थोड़ी जान पहचान थी। हम एक दुसरे का नाम अब भी नहीं जानते थे । वो मुझे मेरे पैसे से पहचानती थी और मैं उसे उसके सामान से जानता था। किसी किराने की दूकान की तरह ।

एक रात मैं थोडा देर से पहुंचा तो वो किसी और के साथ थी। लाख झगड़े के बाद भी मुझे अन्दर जाने नहीं दिया उस दलाल ने । मैं वहाँ से लौट आया । मुझे गुस्सा था । पता नहीं किसी बात पर। शायद
रोज जाने के कारण मुझे अब वो मेरी प्रॉपर्टी लगती थी । उसके साथ होने का हक अब बस मुझे था । वो मैदान का वो कोना थी जहाँ केवल मैं खेल सकता था । 
दूसरे दिन मैंने उसे बहुत उल्टा सीधा कहा ।
"तू थोड़ी देर मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थी"
"क्यों"
"क्यों???......तुझे नहीं पता मैं रोज़ आता हूँ यहाँ"
"तो क्या हुआ??? तूने खरीदा नहीं है मुझे....."
"साली रंडी!! खरीदा नहीं है तुझे लेकिन तू मेरी है....सिर्फ मेरी"

उसके बाल अब मेरी मुठ्ठी और होंठ होंठों में थे । एक पुरुष ने फिर शक्ति से अधिपत्य जता दिया था । मैंने रेत मुट्ठी में बाँध ली थी । 

उस रात वो कुछ नाजुक सी लग रही थी.... जैसे कहीं कोई जोड़ खुल गया हो......एक गाँठ जिसके सहारे उसने सब कुछ संभाल रखा था वो टूट रही थी । बिखर रही थी वो । लेकिन उस समय मुझे ये सब नहीं दिखा । मैं अपने पुरुषत्व की जीत की ख़ुशी मन रहा था। 

उस रात के बाद वो मुझे कभी नहीं मिली । कोई नहीं जानता वो कहाँ गयी। क्यूंकि वो रेत थी....मैंने उसे मुट्ठी में बाँधने की गलती कर दी थी.......और वो मेरी मुट्ठी से जाने कब फिसल के गायब हो गयी । रेत ऐसी ही होती है ।

3 टिप्‍पणियां:

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