गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

स्वप्न सुंदरी



हे प्रभु ! मेरी स्वप्न  सुंदरी 
अब तो यथार्थ बन आ जाये 
उसको पाकर जीवन मे मेरा 
मन हर्षित, पुलकित हो जाए 

स्वेत वर्ण और केश स्वर्ण हो,
जो देखे चकरा जाये |
सुंदर, कोमल, मधुर, कर्णप्रिय
बोले तो मन भा जाये |

चले चाल सावन मयूर सी,
बल खा के इतरा जाये |
नयन मृगी से चक्षु हो दोनो,
मदिरा सा रस छलकाए  |
खिले फूल, फुलवारी आँगन, 
हल्का सा जो मुस्काए |

केश ढापते मुख को, जैसे
मेघ चन्द्र पे छा जाये |
फिर संवार उनको शर्माती,
जैसे कोई कली चटक जाये |

कर श्रृंगार जैसे वो निकले,
लगे कोई दुल्हन आये |
हृदय की वाणी चक्षु बोलते,
शीतलता चन्दन छाए |

अंग अंग में रंग भरा हो,
इन्द्रधनुष भी पछताए |
माथे पर यू गोल बिन्दु सा,
सूरज दूर नजर आये |

कर लिहाज यूं चले वो , जैसे 
दंबे पाँव निंदिया आये |
ऐसा रूप हो सुंदर उसका 
कोई न उस सम हो पाये |


हे प्रभु ! मेरी स्वप्न सुंदरी, 
अब तो यथार्थ बन आ जाये | 

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 14/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब ,आपकी प्रार्थना जल्द स्वीकार हो ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह!
    श्वेत वर्णीय और स्वर्ण केशीय स्वप्न सुंदरी आपको जल्द मिले....
    बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  5. आप सभी सज्जनों को सधन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

लोकप्रिय पोस्ट