सोमवार, 13 जून 2011

कुछ यूँ हो, कि गुफ्तगू हो


चलो कि फिर आज कुछ यूँ हो
हम हों तुम हो और थोड़ा जुनूँ हो |
ज़िन्दगी और मौत एक दूजे से भागी है बहुत 
कुछ यूँ करो की दोनों एक दूजे से रू-ब-रु हों  |

ज़िन्दगी के सफ़र में, मैं बातें करना भूल गया
आओ बैठो साथ ज़रा, कुछ देर गुफ्तगू हो |
  
मैंने शिकवे शिकायत तुम्हारे कभी सुने ही नहीं
पर छोडो उनकी बात भी, आज क्यूँ हो |

तेरे पहलू में गुज़र जाये ये रात-ए-खिज़ा 
पर तेरा दामन है तो सुबह-ए-फिजा भी क्यूँ हो |

सुकून-ओ-दर्द की ज़िन्दगी से हूँ उकता सा गया 
चलो कहीं ऐसी जगह  के जहाँ न दर्द न सुकूँ हो |

चलो की फिर आज कुछ यूँ हो
हम हों तुम हो और थोड़ा जुनूँ हो |

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...बहुत खूब ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  2. प्रेमिका ही तो जीवन को महकाती है ……………बेहद उम्दा भाव सौन्दर्य्।

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  3. वाह कितना सुन्दर लिखा है आपने, कितनी सादगी, कितना प्यार भरा जवाब नहीं इस रचना का........ बहुत खूबसूरत.......

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  4. बहुत बहुत शुक्रिया भास्कर जी ....

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  5. प्रेमी-प्रेमिका के मध्य प्रेम संवाद का बड़ा ही खूबसूरत चित्र खींचा है| पढकर दिल खुश हो गया| बहुत बहुत शुभकामनाएं|

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