रविवार, 14 अगस्त 2011

जलन



ढूद्ती रहती है नज़रें हर घडी उनको ,
सहर से शाम तलक याद करें हम उनको | 
वो काश मेरे होते तो गम कैसा,
न मिले तो दिल पर क्या बीतेगी क्या पता उनको 


                                   सांझ की दहलीज पर  दिखा  रौशनी सा है,
                                    जाने दिल है जला या जला है दिया |
                                    जलन की आग सुलग रही है ऐसे,
                                     कितने सपने जला गई क्या पता उनको|

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना , सार्थक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और ढेर सारी बधाईयां

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ भावपूर्ण कविता लिखा है आपने! शानदार प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

लोकप्रिय पोस्ट