रविवार, 25 मार्च 2012

ख़ता



उसकी इस ख़ता की भी कोई सज़ा नहीं  
मिलने का किया वादा पर वो  मिला नहीं

वो हसीं बात आज उसने ही बोल दी यारो  
जो मेरे दिल मे थी मैंने मगर  कहा नहीं

हाल-ए-दिल खत में तुझे तो मैंने रोज़ लिखा
क़ासिद को खत दिया पर तेरा पता लिखा नहीं  

मेरी खता है जो छूना तुझे चाहूँ मैं मगर
इतना हसीं है तू, क्या तेरी कोई खता नहीं ?

मुझपे पहला पत्थर किसी अपने ने उछाला था   
और तो गैर थे मुझे उनसे कोई गिला नहीं

इन अमीरों के आगे हाथ क्यूँ फैलाये "विक्रम"
ये भी तो इंसान हैं साहब, कोई खुदा नहीं

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हर शेर लाजबाब , मुबारक हो

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 26-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

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  3. शुक्रिया चन्द्रभूषण जी.....:)

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  4. बेहतरीन रचना ,मुखर अभिव्यक्ति प्रशंशनीय है / शुभकामनायें जी /

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  5. उदय जी, संजय जी, दीपिका जी एवं सदा जी.....आप सभी आदरणीय जनों का दिली शुक्रिया ....प्रेम और आशीर्वाद बनाए रखें....:)

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  6. बहुत ही खूबसूरत गजल....बहुत खूब

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  7. वाह!!!
    बहुत बढ़िया गज़ल विक्रम जी.
    दाद कबूल करें..

    अनु

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  8. पल्लवी जी, अनु जी ......बहुत बहुत शुक्रिया...:)

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