रविवार, 9 अक्तूबर 2011

संताप



इतना संताप सताता है, 
अब सुख  भी सहा न जाता है |
है हृदय भरा चीत्कारों से, 
अब नहीं सुनाया जाता है |

रुँध गया कंठ, हे नीलकंठ !
करुणा का अश्रु न भाता है |
अब करो अंत इस जीवन का,
कोई राह नहीं दिखलाता है |

इतना संताप सताता है,
अब नही सुनाया जाता है |

हे प्राणनाथ ! निष्प्राण हूँ मैं, 
अब कुछ भी नहीं लुभाता है |
इस शोक समाहित दुनिया में,
अब और रहा न जाता है |

इतना संताप सताता है,
अब नही सुनाया जाता है |

कुछ करो नाथ, इस तुच्छ साथ, 
अब साथ नही कोई आता है |
इक आस है तेरी दया सिंधु,
मुख गीत तेरा ही गाता है |

इतना संताप सताता है, 
अब नही सुनाया जाता है |

अब क्षमा  करो इस पापी को,
यह शरण में तेरी आता है |
है ज्ञान हुआ इस शापित को,
तू दौड़ के क्यूँ न उठाता है |

इतना संताप सताता है, 
अब सुख  भी सहा न जाता है |
है हृदय भरा चीत्कारों से, 
अब नहीं सुनाया जाता है |

6 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर इस संताप को मिटाए ...
    शुभकामनायें!

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  2. सुंदर प्रार्थना ,परमपिता से ।

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  3. सुन्दर और सार्थक रचना , बधाई

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  4. आह.....करूँ पुकार नीलकंठ से....गज़ब रचना

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  5. nahi suni jati wo chikh pukar jo dil dehla de, nahi suni jati waqt ku chikhti pukar, nahi sunna mujhe kuch jo mere aspas h, jo jivan ko hila de........

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