बुधवार, 3 नवंबर 2010

दूरियाँ

दूर दूर रह के कभी पास चले आओ,
जिसे हम भी गुनगुनाये ऐसा गीत कोई गाओ |
बीते पलों के पन्ने चलो साथ साथ खोलें,
हम अपनी बताएं तुम भी अपनी सुनाओ|
दूर-दूर रह के........

हम फातिया करें तुम भागवत कराओ |
हम आयतें पढ़ें तुम चालिसे गाओ |
धर्म, कौम को कुछ पीछे छोड़कर,
अबके हम ईदी बाँटें तुम भंडारे कराओ |
दूर-दूर रह के........

दूर-दूर रह के कुछ यूँ जलसे मनाओ,
हम नात गायें तुम फगुआ गुनगुनाओ |
चलो हमसफ़र अबके कुछ यूँ करें,
की हम सेवइयां पकाएं तुम गुझिया बनाओ |
दूर-दूर रह के........

सरहदों की जगह कोई गुल्स्तां बसाओ,
हम कांटे हटायें तुम फूल उगाओ |
हवाओं संग उड़ के मिलने आयें हम तुम,
हम पुरवाई संग आयें तुम पछुआ संग आओ |
दूर-दूर रह के कभी दूरियाँ मिटाओ,
जिस्म जुदा ही सही दिल से दिल तो मिलाओ |
दूर-दूर रह के........

दूर दूर रह के कभी पास चले आओ........

3 टिप्‍पणियां:

  1. अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां ॰॰॰॰ आपकी रचना की तारीफ को शब्दों के धागों में पिरोना मेरे लिये संभव नहीं

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  2. वाह, बहुत खूब...सुंदर रचना।

    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं।

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  3. धन्यवाद..........महेंद्र जी आप को भी दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें

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