सोमवार, 15 नवंबर 2010

जीवन





आज हुआ क्या ऐसा मानव,
जो आँखों में आंसू   है |
आज हुआ क्या ऐसा मानव,
जो रोने का दिल करता है | 
टूट गया क्या कोई सपना,
या बिछड़ा है कोई अपना |
माना  क़ि दुःख होता है ,
जब कुछ ऐसा होता है |
सपने तो बनते और बिखरते है ,
जीवन में अपने मिलते और बिछड़ते   है,
विरले होते है जो फिर भी बैठे हँसते है | 
छोड़ ये सारी व्यर्थ क़ि चिंता ,
बस तू आगे बढ़ते जाना |
बिना  रुके रस्तों में तू ,
मंजिल पर तू बढ़ते जाना |
सपने तो उनके पूरे होते है ,
जो टूटे सपने फिर से बैठ संजोते है |
कुछ फिर अपने मिल जाते है ,
जब हम आगे बढ़ते जाते है |
मेरा तू बस मान ये कहना,
आगे तू बस बढ़ते जाना,
व्यथित ह्रदय को भरते जाना |
फिर  एक दिन ऐसा आएगा,
जब दुःख तेरा छट जायेगा |
तब कुछ ऐसा  होगा मानव,
आँखों में रश्मि चमकेगी |
तब कुछ ऐसा होगा मानव ,
जीवन में खुसिया छलकेगी |
                                        
[इस चिट्ठे  पर यह मेरी प्रथम रचना  है| अपने विचार जरूर व्यक्त करे.बुरा सही जो भी हो जैसा भी हो अवश्य कहे |विचारों की प्रतीक्षा में आपका अनुज ......................................
                                                                ---विशाल श्रीवास्तव ]

9 टिप्‍पणियां:

  1. good ......too long, though, very good poem......

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  2. " आज हुआ क्या ऐसा मानव जो रोने का दिल करता है "
    बहुत खूब लिखा है |बधाई
    आशा

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  3. aap sabhi ka dhanyavaad aapki amulya pratikriyao hetu.prayaash karunga ki aage aur santulit evam accha likhu.bas isi prakaar se apna pyar aur dular banaye rakhe.

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  4. sundar rachna....blog jagat mein swagat evam shubh kamnayen.........

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  5. सुन्दर लेखन....विचारो कि सजीवता क लिए बधाई....

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  6. उम्दा रचना .......उपस्थिति बनाये रखें विशाल जी

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  7. sunder aur rachnatmak lekhan ki badhai. kabhi hum jaise ko bhi padhne ka waqt nikale. shukriya.

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  8. सबसे पहले तो ब्लोगजगत मे आपका स्वागत है।
    रचना बेहद सकारात्मक और सुन्दर संदेश देती है……………उम्दा प्रस्तुति।

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