गुरुवार, 18 नवंबर 2010

तलाश

फिरता है क्यूँ गली में, क्यूँ भटकता है दर-ब-दर |
हर सू यही सवाल है, यही पूंछे है हर नज़र |
मेरा यही जवाब है, यही बात बोलता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

कल थी जो साथ, पर छिन गयी उनकी गली में |
अपने लबों की खोयी वो मुस्कान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

उनकी उठे मुझ पर भी इनायत की इक नज़र |
उनकी हसीं आँखों का वो एहसान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

 उड़ा ले जाए मेरी गमीं को जो दूर बहुत दूर |
मै उनकी चाहतों के वो तूफ़ान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

 है दूर मगर फिर भी मेरे दिल से जुदा नहीं,
 मेरे दिल के कमरे का वो मेहमान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

सामने बिठा के मैं कर सकूँ उनका भी सजदा,
सालों से मै बस वो इक रमजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

खुद से हूँ बेखबर, नहीं दुनिया का कुछ पता,
 अपने हश्र और हाल से अनजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

4 टिप्‍पणियां:

  1. खुद से हूँ बेखबर, नहीं दुनिया का कुछ पता,
    अपने हश्र और हाल से अनजान ढूँढता हूँ |


    बहुत सुन्दर.....

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  2. बहुत सुन्दर भाई .....लेकिन आपसे एक शिकायत है |

    आप हमेशा ही तन्हाईयों वाली रचना ही लिखते हैं....कभी मिलन को भी आजमा का देखें |

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  3. dear vikram...no doubt that ur writings are beautiful but this one does not follow rules for ghazal....though, keep it up.

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