बुधवार, 24 नवंबर 2010

दरिया

मैं खुद दरिया हूँ, तुमसे मिलने मैं पार आऊँ कैसे ?
तुम्हें मैं अपने दिल का हाल सुनाऊँ कैसे ?
कई घरों मे लगी आग है बुझाई मैंने,
पर जो खुद मुझमे लगी है वो बुझाऊँ कैसे ?
मैं खुद........

मेरी लहरें तेरे साहिल को डुबो देती हैं,
तुमको छूने को मैं हाथ बढाऊँ कैसे ?
लोग सुन लेंगे तो कर देंगे वो बदनाम तुम्हें,
डर है रुसवाई का तो कहो तुमको मैं बुलाऊँ कैसे ?
मैं खुद........

कल तपूँगा धूप में फिर हवा में घुल जाऊंगा,
मिलूंगा गर्द से तो बादल में बदल जाऊंगा |
संग हवाओं के मैं तेरी गली आऊँगा,
तेरे बदन पे मै कुछ यूँ बरस जाऊँगा |
तुझे भिगोऊंगा खुद तुझमें डूब जाऊँगा |
बनके फुहार तेरी जुल्फों से उलझ जाऊँगा |
बूँद बन करके तेरे गालों से ढलक जाऊँगा |
चूम कर होंठ, तेरी गर्दन से उतर जाऊँगा |
है ये वादा के मिलूंगा मैं कल ही तुमसे,
पर ये जो रात घनी है वो बिताऊँ कैसे ?
मैं खुद........

मैं खुद दरिया हूँ, तुमसे मिलने मैं पार आऊँ कैसे ?

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना ... इसमें ये लाइन जोड़ दें ... चल दरिया में डूब जाए ... हा हा

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  2. Waah Bhai..........Lajwaab.....Dil Ko Cheer Kar Rakh Diya.........gr888888888...

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  3. सुन्दर रचना ,.......सांकेतिकता ने छू लिया...

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. कई घरों मे लगी आग है बुझाई मैंने,
    पर जो खुद मुझमे लगी है वो बुझाऊँ कैसे ?
    fantabulos lines bro...u r just terrific..ummmmhhaa

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