शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

नासमझ

तुम्हे शिकवा है कि हमको इश्क करना नहीं आता |
हमें ग़म है कि हमको आज बस इतना नहीं आता |
तुम्हारी हर शिकायत का जवाब भी  है हमारे पास,
मगर हर बात को जुबाँ से हमें कहना नहीं आता |
हमें गम है कि......

अरमाँ लाख उठते हैं लहरों से, इस दिल में |
मगर लफ्जों में पिरो इनको, हमें ख़त लिखना नहीं आता |
हमें ग़म है कि......

हम हैं नासमझ, हमको न आता हो भले कुछ भी |
न कहना कि हमें तुम पर अभी मरना नहीं आता |

न कहना कि हमें तुम पर अभी मरना नहीं आता |

2 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई
    जब सब हैं हम भाई-भाई
    तो फिर काहे करते हैं लड़ाई
    दीवाली है सबके लिए खुशिया लाई
    आओ सब मिलकर खाए मिठाई
    और भेद-भाव की मिटाए खाई

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