शनिवार, 23 जुलाई 2011

दिनचर्या

सुबह सवेरे रोज़ अँधेरे, 
उठ कर हो गया तंग |
नहीं जागना नहीं  भागना,  
चाहे जो हो दंग |

चाहे जो हो दंग,
अंग में पीड़ा होती |
न जाना होता तो, 
दिन भर क्रीडा होती |

क्रीडा होती मस्त,
गस्त करते हम दिन भर |
दिन से होती साँझ,
और हम सोते जी भर |

सोते जी भर यूँ कि,
जैसे मदिरा पी हो |
सपने में आती इक नारी ,
सुंदर सी जो |

सुंदर सी जो नार मिले, 
तो ब्याह रचाता |
नहीं छोड़ता  जीवन भर,
और साथ निभाता |

साथ निभाता इस से पहले
टुट गयी निंदिया |
घड़ी का कांटा एक तरफ, 
एक तरफ थी खटिया |

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-07-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर मंगलवारीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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