शनिवार, 6 अगस्त 2011

प्रीत कहाँ??



कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ?

सुनते है सब रोज़ ग़ज़ल 
गीत कहाँ ? अरे गीत कहाँ ??

जलते हैं चराग अब हर घर में 
पर दीप कहाँ ?? अरे दीप कहाँ ??

छिड़ते है राग सभी दिल में 
संगीत कहाँ ?? संगीत कहाँ ??

गुलजार गुलिस्तान होता है
पर फूल यहाँ पर रोता है, 

सब जीते है दुनिया की ख़ुशी 
पर जीत कहाँ?? अरे जीत कहाँ??

मिलते है सभी दुनिया में मगर
अब मीत कहाँ?? अरे मीत कहाँ ??

कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ??

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक- 08-08-2011 सोमवार के चर्चा मंच पर भी होगी, सूचनार्थ

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  2. preet kahan ...sachchi preet kahan??
    vicharniye prastuti.achchi abhivyakti.

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  3. गुलज़ार गुलिश्तां होता है
    पर फूल यहाँ पर रोता है.
    वाह!
    सुन्दर अभिव्यक्ति...
    सादर...

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  4. bahut hi sunder dhang se likhi gai bemisaal rachanaa.badhaai aapko.

    "ब्लोगर्स मीट वीकली {३}" के मंच पर सभी ब्लोगर्स को जोड़ने के लिए एक प्रयास किया गया है /आप वहां आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार ०८/०८/११ को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  5. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  6. preet ko preet hi pahchaane hain
    baaki to sab bas naam hi jaane hain...

    bahut hi sundar rachna...

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