शनिवार, 19 नवंबर 2011

हक़




हुस्न की धूप, प्यार की बयार दे दो तुम,
ऐ खुदा ! वो सुबह एक बार दे दो तुम ।

उसको पाकर ही मेरे दिल को चैन आएगा 
मेरा सुकून वो मेरा करार दे दो तुम 

शहर फिजूल है, ये शहर अपने पास रखो 
इंतेजा है कि बस  कूचा-ए-यार दे दो तुम

बड़े दिनों के हैं ताल्लुकात तेरे मेरे 
दोस्ती निभाओ, अमां यार दे दो तुम 

मेरे जीने का फैसला तुझे ही करना है
मुझे घर दो चाहे मज़ार दे दो तुम 

मेरा हक़ है जो मांगा है मैंने तुझसे खुदा 
मैंने कब मांगा के मुझको उधार दे दो तुम 

8 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा हक़ है जो मांगा है मैंने तुझसे खुदा
    मैंने कब मांगा के मुझको उधार दे दो तुम



    वाह खूबसूरत शे'र ....बधाई

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  2. मेरा हक़ है जो मांगा है मैंने तुझसे खुदा
    मैंने कब मांगा के मुझको उधार दे दो तुम
    yah sher to bakai sher hai vikram ji mubarak ho

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  3. मेरे जीने का फैसला तुझे ही करना है
    मुझे घर दो चाहे मज़ार दे दो तुम

    simply superb bro....keep up the gud work

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  4. bahut khoob bhai ! mere blog ko bhi visit karen ! dhayavaad ! www.aditya-justkidding.blogspot.com

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  5. Very nice attempt vikram............:)

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  6. बड़ा माँगा है ह़क खुद का खुदा से तुमने ,
    कभी खुद को खुदा पे वार दे दो तुम

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  7. वाह मै कायल हो गया हूँ इन शेरो का
    अपनी इन पंक्तियो को उधार दे दो तुम

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