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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

इंतज़ार


दरवाजा खुला रखो, इंतज़ार करो 
कभी किसी मुसाफिर से प्यार करो

कलियों ! आज ज़रा देर से खिलो
प्यासे भँवरे को और बेक़रार करो 

तनहाई में कमरे से भी बात करो
कभी दीवारों को अपना राज़दार करो 

तुम्हारी नफरत से मैं नहीं डरने वाला 
रास्ता अब कोई और इख्तियार करो 

बुत-ए-पत्थर का अब भरम छोड़ो 
आओ सजदा-ए-दिल-ए-यार करो

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 

रात ढल जाने दो 
चाँद गल जाने दो
हो जाने दो सहर 
सूर्य जल जाने जो

बस कहती रहो
तुम कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 


शब्द खोये हैं मेरे 
कुछ भी करूँ कैसे बयाँ 
तुम जानती हो सब 
कहने को बाकी क्या रहा 


बस तेरे ख्वाब खुद मे 
मैं बुनता रहूँ
तुम कहती रहो
बस मैं सुनता रहूँ

बीत जाये ज़िन्दगी 
तेरी बातों में यूँ ही 
तू है साथ तो मुझे  
मौत का भी डर नहीं 
काट लूँगा हर सफ़र 
संग जो तुम चलती रहो 


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 


बस कहती रहो 
बस...
कहती ही रहो.......

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

उम्मीद

हर रोज़ सवेरे उठता हूँ,
खिड़की से बाहर तकता हूँ,
सोचता हूँ -
पौधों में कली लगी होगी,
अपनी बगिया भी सजी होगी,
हर तरफ फिजा छाई होगी |
और शायद तू आई होगी |
पर ये हवा बहार नहीं लाती है,
हर रोज़, तू नहीं आती है |

हर शाम मैं छत पर चढ़ता हूँ,
और लाख उम्मीदें गढ़ता हूँ |
सोचता हूँ -
ये आकाश आज गुलाबी होगा,
मौसम भी आज शराबी होगा |
हर ओर मदहोशी छाई होगी,
और शायद तू आई होगी |
पर उम्मीदें धोखा खाती हैं |
हर शाम तू नहीं आती है |

कल रात पवन कुछ यूँ मंद चली,
चहक उठी मेरी सूनी सी गली |
मौसम भी शराबी होने लगा,
ओर बीज फिजा के बोने लगा |
मेरे संग एक परछाई थी,
कल सपने में तू आई थी |

कल सपने में तू आई थी |

सोमवार, 22 नवंबर 2010

सपने

ज़िन्दगी का ताना बाना बुनता है मिटाता है मन,
खुद के रचे इस इन्द्रजाल में खुद ही उलझ सा जाता है मन |
अपने जिन ख्वाबों का सिर पर ताज पहन कर तनता था ये,
आज उन्ही सपनों का बोझा क्यूँ कर ना सह पता है मन |
ज़िन्दगी का ताना बाना.....


कुछ सपनो की चादर ओढ़े, कहीं दुबक कर बैठा था बचपन |
अपने जिन सहज सरल सपनों को , उँगलियों पर गिनता था बचपन |
अपने सपनों की राहों पर रोज़ घूमने जाता था ये ,
आज उन्ही राहों पर बढ़ने, से क्यों है कतराता ये मन |
ज़िन्दगी का ताना बाना.....

 ज़िन्दगी का ताना बाना बुनता है मिटाता है मन |

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

नसीब

अभी शब् है के कोई ख्वाब सहेजें आओ |
अपनी सुबह को हसीं और भी कर दे आओ |
लम्हे खुशियों के जो बिखरे है आज |
उन्ही लम्हों को फिर से समेटें आओ |
अभी शब् है......

रात काली है मगर चांदनी की तो है आस |
हमको कुछ देर भी हुई तो है आज |
सुबह भूले थे मगर शाम को लौटें आओ |
अभी शब् है.....

बस करो अब अपने नसीब पर रोना |
न कहो के होगा वही जो है होना |
अपनी किस्मत को अपने हाँथ से लिख दें आओ |
अभी शब् है......

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