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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कहानी : "रेत"

                उसके यूँ तो छमिया, छम्मकछल्लो, हरामजादी, रानी वगैरह कई नाम थे, मगर मुझे उसके नाम में कभी दिलचस्पी नहीं रही ...वो हर बार कुछ और बन जाती थी मेरे लिए.....और मैं इसीलिए उसके पास जाता था
वो मेरे लिए समंदर किनारे की रेत थी जब तक दिल किया उसके साथ खेला....... कुछ भी अपने मन का गढ़ा और फिर लात मार कर चल दिया
समंदर किनारे की रेत केवल दिल बहलाने के लिए होती है उसे कोई घर में नहीं सजाता और जब दिल बहल जाए तो हाथ झाड कर निकल जाते हैं....
मुझे उसके कौन सी बात पसंद थी या कौन सी बात नापसंद थी ये कहना मुश्किल है
कभी ध्यान नहीं दिया.....बस एक ही बात थी जो बहुत अजीब लगती थी.....अच्छी या बुरी में तौलने की कोशिश न करिए......बस अजीब....और वो ये की वो सीधे आँखों में देखती थी......एक टक...... बिना पलक झपकाए ........घूर कर नहीं.......बस यूँ की मुझमे कुछ खोज रही हो......या अपनी आँखों में मुझे कुछ दिखाने की कोशिश कर रही हो .....मुझमें उसे क्या दिखा क्या मिला मैंने कभी पुछा नहीं उसने कभी बताया नहीं
लेकिन मैंने कई बार उसकी आँख में अपना अक्स देखा है.....उसमे मैं अच्छा नहीं दिखा कभी.......हलाकि मेरे घर का आईना मुझे हमेशा खूबसूरत बताता है...लेकिन नहीं हमेशा कुछ काला सा दीखता था 

पर ये कहानी मेरी नहीं उसकी है....उसकी जिसका नाम मुझे नहीं पता.....
हर कहानी शुरू से शुरू होती है मगर उसकी कहानी की शुरुआत कब कहाँ कैसे और क्यूँ हुयी कोई नहीं जानता, वो बाज़ार में कब लायी गयी और कितनी बार बिकी किसी ने इसका हिसाब रखने की ज़रुरत नहीं समझी...... उसने खुद ने भी नहीं । मेरे लिए उसकी कहानी तब शुरू हुयी जब मैं उससे पहली बार मिला या यूँ कहूं की जब मैंने उसे पहली बार खरीदा या उसके शब्दों में मैंने पहली बार उसे भाड़े पे लिया ।
दलाल को बाहर पैसे देकर मैं कोठा नंबर 27 में दाखिल हुआ.....कोठे की जो इमेज दिमाग मे थी उससे काफी अलग थी वो जगह.......इस दस बाई दस कमरे की दीवरों पर हल्का हरा रंग लगाया गया था जो सीलन से कुछ हिस्सों में पपड़ी छोड़ रहा था......दरवाज़े से बिलकुल बगल एक मेज़ पर कुछ मेकप का सामान करीने से रखा था......उसके ठीक ऊपर दीवार पर एक छोटा आइना था....सामने दीवार पर दो तस्व्वेरें थी जिनमें किसी नेचुरल लैंडस्केप के ऊपर कोई अंग्रेजी सूक्ति लिखी थी......दाई और की दीवार पर एक खिड़की थी जो शायद ही कभी खुली थी......कमरे में घडी नहीं दिखी......बाहर दलाल लेकिन समय के हिसाब से पैसे ले रहा था........बिज़नस टैक्टिक्स!!......बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था....जो हलके कपडे के परदे से ढँक हुआ था.....मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ती या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी.....छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था.......पंखे से ठीक नीछे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी......चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे....
उसी चादर पर बैठी थी वो ......गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में.....मुस्कुराती हुयी
"आओ साहब.......क्या लोगे??"
यूँ तो ये सवाल काफी सीधा था मगर इसके जवाब कई हो सकते थे.......इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में बिताये हुए दो साल इतना तो सिखा चुके थे की हर बात कई मतलब लिए होती है और एक गलत जवाब आपका मजाक बना सकता था
"यहाँ लोग क्या लेने आते है"
"वो तो लेने वाले पे डिपेंड करता है.....मेरी तो भाड़े पर देने की दूकान है जो चाहो मिल जाएगा.....यहाँ कोई अपनी बीवी लेने आता है तो कोई माशूका किसी को फिल्मी हिरोइने चाहिए तो कोई रंडी की तलाश में यहाँ आता है तुम्हे क्या चाहिए भाड़े पे???
"एक रंडी के मुंह से इतनी फिलासफी अच्छी नहीं लगती"
"ह्म्म्म.....तो तुम्हे केवल रंडी चाहिए.....हाज़िर है"
उसके बाद उसने एक शब्द नहीं कहा......अब वो रेत मेरी थी.....अब मैं उसका क्या करूँ मेरी मर्ज़ी थी.... 
मैंने जी भर खेल कर वो रेत उसी बिस्तर पर बिखेर दी । 
धीरे धीरे मैं उसका नियमित ग्राहक बनता गया । सेक्स में ये अजीब सा गुण है आप जितना उसमे डूबते हो वो उतना ही और अन्दर खींचता है । पहले महीने में फिर दस दिन में और फिर हफ्ते में दो तीन बार मुझे उसकी ज़रुरत पड़ने लगी । अब हम थोड़ी बहुत बातें भी कर लेते थे। ज्यादातर वो बातें मेरे कालेज के बारे में होती थी । उसे उनमे काफी दिलचस्पी लगती थी। 

पिछले सात महीने में उसने केवल एक बार मुझे वापस लौटाने की कोशिश की थी । उस दिन वो काफी थकी लग रही थी। लेकिन दलाल ने उसे जबरदस्ती तैयार कर लिया । उस दिन पहली बार मुझे लगा की वो जिंदा है..... उस दिन शायद उसे भी पहली बार लगा की मैं इंसान हूँ । हमने कुछ किया नहीं उस रात। केवल बातें की

"तू ये सब पढ़ के कितना कम लेगा रोज़?"
"रोज़ नहीं ...महीने के मिलेंगे....कम से कम 25 30 हज़ार"
"कितने घंटे काम करना होगा"
"10 घंटे ....कभी कभी ज्यादा भी हो सकता है"
"कितने साल तक??"
"जब तक मैं चाहूँ....50 का होने तक तो कर ही सकता हु"
"साला तुम लोग अच्छे रंडी हो......हम लोग का तो 35 के बाद ख़तम."
"मैं इंजिनियर हु....."
"कौन सा रंडी से कम हो.....हम तो केवल शरीर बेचते हैं.....तुम तो दिमाग भी बेंच दोगे...... लेकिन दाम अच्छा मिलता है तुमको।"
मेरे पास उसका जवाब नहीं था.....था भी तो मैं दे नहीं पाया जाने क्यों??
"जानता है मुझे बचपन का कुछ याद नहीं.....माँ बाप भाई बहन कुछ नहीं । बस एक ही बात याद आती है । मुझे दुल्हन बनना बहुत अच्छा लगता था । सज धज के अपने आदमी का इंतज़ार करना । और किस्मत देख आज मैं रोज दुल्हन बनती हूँ..... रोज आदमी का इंतज़ार करती हूँ । फर्क बस इतना है मेरा आदमी बदल जाता है । "
कुछ देर रूककर उसने खुद को आईने में देखा और हसने लगी 
"कितनी खुशकिस्मत हूँ मैं" 
मैंने दो तीन पानी की बूँदें महसूस की थी उसी समय अपने हाथ पर। 
पता नहीं वो उसके आँख के थे या मेरी आँख के या शायद छत टपक रही थी 
उस रात उसने और भी बहुत कुछ कहा था पर मैंने कुछ सुना नहीं....मैं उन दो बूंदों की गुत्थी में ही उलझ के रह गया ।
उस रात के बाद हमारा रिश्ता कुछ बदल गया । ये प्यार नहीं था........दोस्ती या सहानुभूति जैसा भी नहीं था । जाने क्या था वो। बस एक रिश्ता था ।
अब मैं वहां रोज़ जाता था। वो अब भी दुकानदार थी और मैं खरीददार बस हममें अब थोड़ी जान पहचान थी। हम एक दुसरे का नाम अब भी नहीं जानते थे । वो मुझे मेरे पैसे से पहचानती थी और मैं उसे उसके सामान से जानता था। किसी किराने की दूकान की तरह ।

एक रात मैं थोडा देर से पहुंचा तो वो किसी और के साथ थी। लाख झगड़े के बाद भी मुझे अन्दर जाने नहीं दिया उस दलाल ने । मैं वहाँ से लौट आया । मुझे गुस्सा था । पता नहीं किसी बात पर। शायद
रोज जाने के कारण मुझे अब वो मेरी प्रॉपर्टी लगती थी । उसके साथ होने का हक अब बस मुझे था । वो मैदान का वो कोना थी जहाँ केवल मैं खेल सकता था । 
दूसरे दिन मैंने उसे बहुत उल्टा सीधा कहा ।
"तू थोड़ी देर मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थी"
"क्यों"
"क्यों???......तुझे नहीं पता मैं रोज़ आता हूँ यहाँ"
"तो क्या हुआ??? तूने खरीदा नहीं है मुझे....."
"साली रंडी!! खरीदा नहीं है तुझे लेकिन तू मेरी है....सिर्फ मेरी"

उसके बाल अब मेरी मुठ्ठी और होंठ होंठों में थे । एक पुरुष ने फिर शक्ति से अधिपत्य जता दिया था । मैंने रेत मुट्ठी में बाँध ली थी । 

उस रात वो कुछ नाजुक सी लग रही थी.... जैसे कहीं कोई जोड़ खुल गया हो......एक गाँठ जिसके सहारे उसने सब कुछ संभाल रखा था वो टूट रही थी । बिखर रही थी वो । लेकिन उस समय मुझे ये सब नहीं दिखा । मैं अपने पुरुषत्व की जीत की ख़ुशी मन रहा था। 

उस रात के बाद वो मुझे कभी नहीं मिली । कोई नहीं जानता वो कहाँ गयी। क्यूंकि वो रेत थी....मैंने उसे मुट्ठी में बाँधने की गलती कर दी थी.......और वो मेरी मुट्ठी से जाने कब फिसल के गायब हो गयी । रेत ऐसी ही होती है ।

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

इंतज़ार


दरवाजा खुला रखो, इंतज़ार करो 
कभी किसी मुसाफिर से प्यार करो

कलियों ! आज ज़रा देर से खिलो
प्यासे भँवरे को और बेक़रार करो 

तनहाई में कमरे से भी बात करो
कभी दीवारों को अपना राज़दार करो 

तुम्हारी नफरत से मैं नहीं डरने वाला 
रास्ता अब कोई और इख्तियार करो 

बुत-ए-पत्थर का अब भरम छोड़ो 
आओ सजदा-ए-दिल-ए-यार करो

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

बे-बहर ग़ज़ल



इजहार-ए-इश्क़ तो दोनों ने किया था
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया

इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया


ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया


कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया


मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"


तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 

रात ढल जाने दो 
चाँद गल जाने दो
हो जाने दो सहर 
सूर्य जल जाने जो

बस कहती रहो
तुम कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 


शब्द खोये हैं मेरे 
कुछ भी करूँ कैसे बयाँ 
तुम जानती हो सब 
कहने को बाकी क्या रहा 


बस तेरे ख्वाब खुद मे 
मैं बुनता रहूँ
तुम कहती रहो
बस मैं सुनता रहूँ

बीत जाये ज़िन्दगी 
तेरी बातों में यूँ ही 
तू है साथ तो मुझे  
मौत का भी डर नहीं 
काट लूँगा हर सफ़र 
संग जो तुम चलती रहो 


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 


बस कहती रहो 
बस...
कहती ही रहो.......

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

मेरा नया घर


अब मैं यहाँ नहीं रहता
याद और ग़म की ये गली 
अब छोड़ दी है मैंने
मैंने नया घर बनाया है
उधर खुशियों की तरफ
मुस्कान के बगीचे के बगल मे 
मिलना हो अगर मुझसे 
आ जाना उधर कभी भी 
भूलने लगो अगर रास्ता
पूछ लेना किसी जुगनू से
घर तक छोड़ देगा......

बुधवार, 23 जनवरी 2013

खुशबू


तुम तो यहीं थी 
मेरे भीतर
एक खुशबू की तरह 

मुझे महकाती हुयी 
और मैं पागल 

ढूँढता रहा तुम्हें बाहर 
कस्तूरी मृग की तरह 


पर तुम चुप क्यूँ रही?

कुछ तो कहती

डांट ही देती मुझे
मेरी मूर्खता पर
या आनंद आता है
मुझे सताने मे 
यही बता दो अब



क्या मेरे कष्ट

मेरे दुख देख 

तुम्हें पीड़ा न हुयी
नहीं लगा तुम्हें 
प्रेम की खुशबू 
काफी नहीं है 
सहारा चाहिए था मुझे?



नहीं लगा यदि 

ऐसा कुछ तुमको 

तो फिर अब मुझमे 
बस कर नहीं कोई लाभ
छोड़ दो मुझे 
मेरे हाल पर
ले लो अपनी खुशबू 
मुझे महकने दो अब 
मेरी तरह


...........

सोमवार, 21 जनवरी 2013

बदलाव


दिन भी बदला रातें बदलीं 
बदले मौसम चार 
पर विक्रम वही का वही 

कपड़े बदले लत्ते बदले 
बदले साज श्रंगार 
पर विक्रम वही का वही 

शक्लें बदलीं अक्लें बदली 
कोई बदले रूप हजार 
पर विक्रम वही का वही 

रिश्ते बदले नाते बदले
बदले नेक विचार 
पर विक्रम वही का वही 

कुछ बुरे जो बदले अच्छे बदले 
कुछ बदल हुये बेकार
पर विक्रम वही का वही 

बाबा बदले नेता बदले
है दल बदलू सरकार 
पर विक्रम वही का वही 

ये विक्रम ससुरा क्यूँ न बदले 
अब बदल भी जाओ यार 
पर विक्रम वही का वही

रविवार, 20 जनवरी 2013

चिल्लर (तीसरी किश्त)


1
मेरी गुस्ताख़ नज़रों से जो बच पाओ तो बच लो तुम
नज़र का तीर है इसको कोई पर्दा क्या रोकेगा??
…………………………………………
2
 बड़े अनमोल मोती हैं इन्हे यूं ज़ाया न करो
हर किसी की बात पर यूं मुस्कुराया न करो
इन खंजरों से होना क़त्ल बस मेरा ही हक़ है
मुस्कान के खंजर सब पे यूं चलाया न करो
…………………………………………
3
 तेरी गली से गुजरता हूँ तो आँखें मूँद लेता हूँ
डर है कि तुझे देखा तो रस्ता भूल जाऊंगा
…………………………………………
4
 वो मज़ा और वो सुकून अब नींद मे कहाँ ??
जो तेरी याद मे है जाग के आँसू बहाने में ...
…………………………………………
5
 चमकते चाँद से पूछो पिघलती रात से पूछो
कितने आँसू बहे मेरे ये इस बरसात से पूछो
…………………………………………
6
 मुझे जब नींद आई तो भी मैं सोया नहीं
मेरे ख्वाबों भी तुम मुझको छोड़ जाते हो
…………………………………………
7
 फेहरिस्त-ए-आशिकान मे सबसे ऊपर नाम मेरा लिख दो
मैं इक गुमनाम शायर हूँ, नाम बदनाम मेरा लिख दो
…………………………………………
8
 तेरा ही नूर है मुझमे, तुझे बाहर मे क्यूँ ढूँढूँ
जब तेरी याद आती है, मैं आईना देख लेता हूँ
…………………………………………
9
 वो प्यार करेगी तुमसे, उसे प्यार करने की वजह तो दो
ज़रा दिल साफ करो, उसे दिल मे रहने की जगह तो दो
…………………………………………
10
 तेरे आने से मेरी ज़िंदगी यूं गुलशन है कि
दश्त-ए-ग़म मे भी अब चाहत के फूल खिलते हैं....
…………………………………………
11
 दिल चाहा के तुझको बुला लूँ चुपके से मैं ख्वाबो में
ये भी तो हो न सका लेकिन,मुझे नींद न आई रातों में
…………………………………………
12
 कोई नहीं शरीफ यहाँ, बस शरीफ बनते हैं
नकाब लगाकर ही ये घर से निकलते हैं
किसी के आँसू किसी की हंसी का कारण है
दर्द ओ ग़म से भी लोगों के दिल बहलते हैं
…………………………………………
13
 आधी रात अकेले मे जब नींद नहीं आती हमको
सोच के तेरी बातों को तन्हा मुसकाया करते हैं
…………………………………………
14
 इस लफ्ज को हम जानते थे पहले भी मगर
वो अजनबी हमें प्यार का मतलब सिखा गया
…………………………………………
15
 दिल पर नहीं है ज़ोर, इसको रोक लूँ कैसे
फिर चल पड़ा है देखो मोहब्बत की राह पे
…………………………………………
16
 मैं हूँ दर्द का सौदागर, मैं दर्द बेचता हूँ
जब दर्द न हो तो भरे जख्म कुरेदता हूँ
कहने को तो सुख़न में सुख आता है मगर
यहाँ दुख से भरा हर सुख़नवर देखता हूँ...
…………………………………………
17
 उनकी नफ़रतों से दिल जाने क्यूँ प्यार कर बैठा
बेगुनाही को अपनी ये गुनहगार कर बैठा
करने आए थे कुछ और, और कुछ और  कर बैठे
इश्क़ की बेखुदी मे क्या न जाने यार कर बैठा
…………………………………………
18
 कल राह मे अचानक किसी ने नाम पूछा तो
बेखयाली में हम उनका नाम कह गए
आज जब उन्होने कहा मेरी तारीफ करो तो
जाने हम क्यूँ खुदा का कलाम कह गए
…………………………………………
19
 पुकार लेना मुहब्बत से जो दिल चाहे अकेले में
इन नामों की नुमाईश जहाँ में मगर अच्छी नहीं लगती
…………………………………………
20
 किसी के इश्क में पड़कर भी कभी देखिये "विक्रम"
उसकी बदसलूकी भी अदा इक शोख़ लगती है .
…………………………………………
21
 वो समझेंगे कभी तो, बस तू समझाए जा
बुझाने दे चराग उनको, तू फिर जलाए जा
कहाँ जा रहे हैं वो, खुद उनको नहीं पता
वो सुनें न सुनें राह तू उनको बताये जा
…………………………………………
22
 उनसे कह तो दिया कि तन्हा ही जी लेंगे मगर
तन्हाई में जीना हमें आता ही कहाँ है....
…………………………………………
23
क्या कहें तुमसे कि हमें ग़म है क्यूँ
क्या बताएं तुम्हे ये आँखें नम है क्यूँ
जलने कि है आदत मेरी, चुपचाप जलने दो
मत पूंछो कि इस दिल में जलन है क्यूँ
…………………………………………
24
 कभी खुद की न थी फिक्र, मौत से डर न था मुझे
जब से तू मिला है यार, बड़ा संभल के चलता हूँ
…………………………………………
25
अपनी इन अदाओ से मेरा दिल ले लिया तूने
नज़र से मारकर मुस्कान से ज़िंदा किया तूने
…………………………………………
26
हर तरफ है रोशनी, है हर सू उजाला
सचमुच तेरे शहर की रात अलग है
…………………………………………
27
मेरे सनम, तुम भी कमाल करते हो
खुद जवाब हो फिर भी सवाल करते हो
…………………………………………
28
तरीके कत्ल के जहां मे और भी है मगर
तुम्हारे इस तरीके से मरने में मज़ा है
…………………………………………
29
सौ बार कहा दिल से, तू उनको याद न कर
बहरा है तेरा खुदा उस से फरियाद न कर
नादान है मेरा दिल मेरी इक मानता नहीं
तड़पेगा रात-ओ-दिन ये शायद जानता नहीं
…………………………………………
30
तेरी हर खता-ओ-गुनाह को तो मैं माफ कर दूंगा
पर ये बता क्या भूल मेरी तू भूल पाएगा


पिछली दो किश्तें-

1- कुछ चिल्लर

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

विक्रम


जो कोई पूछता है, कैसा तू इंसान है विक्रम
कभी शैतान है विक्रम कभी भगवान है विक्रम

वो कहते है समझ पाना तुझे मुश्किल बड़ा है यार
तू दिल से दिल मिलाकर देख बड़ा आसान है विक्रम

है मौसम सा मिजाज इसका पल भर मे बदलता है
कभी है जान-ए-महफिल तो कभी बेजान है विक्रम

बुरा न मानिए साहिब इसकी गफलतों का कुछ
चला जाएगा, पल दो पल का बस मेहमान है विक्रम

है इससे ताल्लुक क्या आपका न सोचिए साहिब
है सबसे आशना बस खुद से ही अंजान है विक्रम

रविवार, 18 मार्च 2012

सफ़र




हयात-ए-ग़म का ये सफर नहीं आसान मेरे यार, 
यहाँ आएंगे अभी और भी तूफान मेरे यार | 

ज़रा सी तीरगी से हो गए हो हिरासान मेरे यार, 
ज़िंदगी है ये तारीकियों का उनवान मेरे यार |

लड़ना मुश्किलों से है हर इंसान की किस्मत, 
इनसे मोड़ ले जो मुंह वो क्या इंसान मेरे यार??

आधे रास्ते से हारकर तुम लौट जाओगे ??
इस कदर न बनो तुम नादान मेरे यार |

कुछ पल ठहर तू, सांस ले फिर बढ़ा चल आगे  
थक जाये गर तू सफर के दौरान मेरे यार 

मौत तो आनी है, इससे डरता क्यूँ है तू ?
मौत आज़ादी और है ज़िंदगी ज़िंदान मेरे यार |

तू कर्म करता जा और न फल की चिंता कर,
खुद गीता में कहता है तेरा भगवान मेरे यार |

औरों के वादे कसमें सब भुला दो लेकिन, 
करो याद खुद से खुद का पैमान मेरे यार |


सोमवार, 5 मार्च 2012

गुजारिश




बेशक गुज़रो मेरी गली से, मगर नकाब ओढ़ के | 
न गिराओ किसी पर बर्क-ए-हुस्न मुझे छोड़ के |

ये बिजलियाँ मुझ पे गिराओ मैं जलना चाहता हूँ 
हद है तेरा हुस्न, मैं हद से गुजरना चाहता हूँ 

हदें तोड़ जमाने की, मुझ पर एतबार तो कर |
मैंने सौ बार किया, तू भी इक बार तो कर |

तू भी इक बार किसी से प्यार कर के तो देख |
सर्द रात छत पे किसी का इंतज़ार करके तो देख |

किसी का इंतज़ार गर न मज़ा देने लगे तो कहना,
बाद-ए-सबा भी उसका न पता देने लगे तो कहना 

बाद-ए-सबा बनीं क़ासिद-ओ-हमराज़ प्यार मे देखो | 
उड़ा के ले गयी ख़त वो मेरा आज प्यार मे देखो |

ख़त मे था लिखा, जो हवा आई उनके घर छोड़ के |
बेशक गुज़रो मेरी गली से, मगर नकाब ओढ़ के |  


रविवार, 4 मार्च 2012

इम्तिहाँ



तू असलियत में क्या है, आज देख लेते हैं ।
तू है पत्थर या खुदा है, आज देख लेते हैं ।

इम्तिहाँ मेरा लिया तूने रोज़ रोज़ खूब । 
आज तेरा इम्तिहाँ है, आज देख लेते हैं ।

मैं तुझे जानता, पहचानता, मानता नहीं ।
तेरे सच से कौन आशना है, आज देख लेते हैं ।

मैं भरोसा करूँ तेरा, या न करूँ, है मेरी मर्ज़ी
क्या तुझे खुद पे भरोसा है, आज देख लेते हैं ।


सोमवार, 30 जनवरी 2012

अभी हारा नहीं हूँ मैं..


बेशक हार हुयी है मेरी
पर हारा नहीं हूँ मैं
मुझको लाचार न समझो तुम
बेचारा नहीं हूँ मैं
रुका हूँ, गिरा हूँ, ज़मीं पर पड़ा हूँ
पर ज़िंदा हूँ अभी,
किस्मत का मारा नहीं हूँ मैं
फिर उठूँगा, बढ़ूँगा,
फ़लक तक चढ़ूँगा
मैं  सूरज हूँ,
उगना ढलना आदत है मेरी
टूट के पल में  खो जाये
वो तारा नहीं हूँ मैं
बेशक हार हुयी है मेरी
पर अभी हारा नहीं हूँ मैं.....

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

ज़िंदगी का कुआँ



जाने क्यों तुम इसे 
मौत का कुआं कहते हो
मेरे लिए तो इसका हर ज़र्रा
ज़िंदगी से बना है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

जैसे ज़िंदगी हमें
गोल गोल नचाती है 
वैसे मेरी मोटर भी 
चक्करों मे चलती है
रंग बदलता है जीवन 
नित नए जैसे
वैसे ही ये अपने
गियर बदलती है
ध्यान भटकने देना 
दोनों जगह मना है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

रफ्तार सफलता की
ऊपर ले जाती है 
और आकांक्षा गुरुत्व है 
संतुलन उस से ही है
यहाँ टिकता वही है
जो सामंजस्य बना चला है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

छोड़ो इन बातों को
ये सब तो बस बातें है
कभी आओ मेरे घर
मेरा घर देखो
इस कुयेँ के कारण ही
आज वहाँ भोजन बना है 
फिर कैसे कहते हो तुम
कि ये मौत का कुआँ है

कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

सोमवार, 27 जून 2011

मैं क्या हूँ??


क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
झूठ होगा जो कहूँ प्यार का दरिया हूँ
इंसानियत का हुनर अभी आया नहीं मुझमे 
और हैवानियत से भी अभी थोड़ा जुदा हूँ 


क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
मैं हर दिन कुछ और बनके जिया हूँ 
खुद की पहचान खो दी है मैंने 
अपनी बहुत सी शाख्शियतो का आशियाँ हूँ 


क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
अपने टूटे ख़्वाबों का बाकी निशाँ हूँ 
यूँ ही कुछ शेर लिख दिए हैं मैंने 
उन्ही शेरों को हर पल में जी रहा हूँ  
....
अब क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ????

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

इंसान हूँ मैं !!

अपनी ही महफ़िल में खड़ा मेहमान सा हूँ मैं,
अपने इन हबीबों से भी तो हुआ अनजान सा हूँ मैं,
अरे लोगों न करो गलती मुझे जिंदा समझने की,
इस सीने के भीतर ज़रा बेजान सा हूँ मैं |

मेरे फ़न ने दीं जब से मुझे बदनामियाँ मेरी,
तन्हाँ कर गयी तब से मुझे तन्हाईयाँ मेरी.
हाँ हूँ शायर मैं लेकिन ज़रा ये भी तो सुन लो सब,
उनके शहर की गलियों में ज़रा बदनाम सा हूँ मैं |

मेरे इश्क ने मुझको दीवाना कर दिया ऐसा,
न रहा इस जहाँ में कोई पागल मेरे जैसा |
ए लोगों चलो माना ये भी के  वहशी हूँ मैं लेकिन,
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |


ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं | 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

Sorry


I am sorry, coz I am not that,
O My Dear! what you want me to be.
& I am sorry, coz I don't have,
all the things that u want in me.

I am sorry, coz sometimes
I can't understand you.
& also for neglecting
the things that u want me to see.

I can change myself for you,
this is sure,
& more than anything i want thee.

But getting you will be of no worth,
O My Love! if I am not me.....

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

पंख

खुले गगन में, वन उपवन में
अब जाने को दिल करता है
बंधन तोड़ के, सब कुछ छोड़ के
उड़ जाने को दिल करता है |
दिल करता है संग हवा के 
 दूर कहीं मैं बह जाऊं 
दिल करता है फिर न लौटूं 
वहीँ कहीं मैं रह जाऊं 
कटी पतंग सा दिल की उमंग सा  
हवा में गोते मैं खाऊँ
फिर न आऊँ कभी ज़मीन पर
रहूँ हवा में इतराऊँ
पर इक इक करके इतने दिन से
चुन चुन के जो जोड़े हैं
अब याद नहीं आता है
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं

याद नहीं आता है 
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं


रविवार, 6 फ़रवरी 2011

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जब तू मेरे साथ (online) होती है
जाने क्या बात होती है 
दिल होता है मेरे सीने में 
पर धड़कन तेरे पास होती है 
नहीं देखा है तुम्हे मैंने 
मगर अपनी सी लगाती हो 
शक्ल और आवाज से ही नहीं 
दिल से भी पहचान होती है 
मैं वहशी हूँ मै पागल हूँ
मैं जानता हूँ ये सब 
मगर मैं इंसान होता हूँ 
जब तू मेरे साथ होती है |
जब तू मेरे साथ होती है |


(यह रचना एक फेसबुक मित्र  के आग्रह पर उनके के लिए लिखी थी )

शनिवार, 27 नवंबर 2010

वो पागल है ?

क्या वो पागल है, जो बेवजह मुस्कुराता है ?
पागल ही है, तभी सरे राह गुनगुनाता है |
अपनी ही धुन में वो गली गली घूमता है |
राह चलते जानवरों को तो कोई पागल ही चूमता है |
वो राहगीर है, उसका कोई घर बार बही है |
उसे किसी का, किसी को उसका इंतजार नहीं है |
बिना खाए पिए भी दिन रात मुस्कुराता है |
ऐसे ही इंसान को तो पागल कहा जाता है |
क्या वो पागल है........

हर तरफ आग है, है हर ओर बस नफरत का धुंआ,
एक दूजे कि जाँ ले रहे हैं हिन्दू मुसलमाँ |
पर उसे फर्क नहीं, वो तो मुस्कुराता है |
जलते चौराहों पर वो नाचता और गाता है |
खिड़की से देख उसे, मैं घबराता हूँ |
दरवाजा खोल, दौड़ उसके पास जाता हूँ |

पूँछता हूँ की क्यों खुश है ? कैसा इंसान है तू ?
ये बता हिन्दू है या कि मुसलमान है तू ?
ये सुनकर के वो और मुस्कुराता है ,
जवाब देकर वो हँसता और आगे बढ़ जाता है |
कहता है- "ना मै हिन्दू हूँ, ना हूँ मुसलमान मै |
 इन वहशियों कि बस्ती में हूँ इकलौता इंसान मैं |
  ये सब हो गए हैं देखो ना बिलकुल पागल |"
इतना कहकर के बढ़ गया आगे वो पागल |
उसको सुन कर के मैं सोच में पड़ जाता हूँ ,
"कौन पागल है ?" खुद से पूँछता लौट आता हूँ....

"कौन पागल है ?".......

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