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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

इंतज़ार


दरवाजा खुला रखो, इंतज़ार करो 
कभी किसी मुसाफिर से प्यार करो

कलियों ! आज ज़रा देर से खिलो
प्यासे भँवरे को और बेक़रार करो 

तनहाई में कमरे से भी बात करो
कभी दीवारों को अपना राज़दार करो 

तुम्हारी नफरत से मैं नहीं डरने वाला 
रास्ता अब कोई और इख्तियार करो 

बुत-ए-पत्थर का अब भरम छोड़ो 
आओ सजदा-ए-दिल-ए-यार करो

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

बे-बहर ग़ज़ल



इजहार-ए-इश्क़ तो दोनों ने किया था
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया

इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया


ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया


कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया


मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"


तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया

सोमवार, 21 जनवरी 2013

बदलाव


दिन भी बदला रातें बदलीं 
बदले मौसम चार 
पर विक्रम वही का वही 

कपड़े बदले लत्ते बदले 
बदले साज श्रंगार 
पर विक्रम वही का वही 

शक्लें बदलीं अक्लें बदली 
कोई बदले रूप हजार 
पर विक्रम वही का वही 

रिश्ते बदले नाते बदले
बदले नेक विचार 
पर विक्रम वही का वही 

कुछ बुरे जो बदले अच्छे बदले 
कुछ बदल हुये बेकार
पर विक्रम वही का वही 

बाबा बदले नेता बदले
है दल बदलू सरकार 
पर विक्रम वही का वही 

ये विक्रम ससुरा क्यूँ न बदले 
अब बदल भी जाओ यार 
पर विक्रम वही का वही

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

विक्रम


जो कोई पूछता है, कैसा तू इंसान है विक्रम
कभी शैतान है विक्रम कभी भगवान है विक्रम

वो कहते है समझ पाना तुझे मुश्किल बड़ा है यार
तू दिल से दिल मिलाकर देख बड़ा आसान है विक्रम

है मौसम सा मिजाज इसका पल भर मे बदलता है
कभी है जान-ए-महफिल तो कभी बेजान है विक्रम

बुरा न मानिए साहिब इसकी गफलतों का कुछ
चला जाएगा, पल दो पल का बस मेहमान है विक्रम

है इससे ताल्लुक क्या आपका न सोचिए साहिब
है सबसे आशना बस खुद से ही अंजान है विक्रम

रविवार, 18 मार्च 2012

सफ़र




हयात-ए-ग़म का ये सफर नहीं आसान मेरे यार, 
यहाँ आएंगे अभी और भी तूफान मेरे यार | 

ज़रा सी तीरगी से हो गए हो हिरासान मेरे यार, 
ज़िंदगी है ये तारीकियों का उनवान मेरे यार |

लड़ना मुश्किलों से है हर इंसान की किस्मत, 
इनसे मोड़ ले जो मुंह वो क्या इंसान मेरे यार??

आधे रास्ते से हारकर तुम लौट जाओगे ??
इस कदर न बनो तुम नादान मेरे यार |

कुछ पल ठहर तू, सांस ले फिर बढ़ा चल आगे  
थक जाये गर तू सफर के दौरान मेरे यार 

मौत तो आनी है, इससे डरता क्यूँ है तू ?
मौत आज़ादी और है ज़िंदगी ज़िंदान मेरे यार |

तू कर्म करता जा और न फल की चिंता कर,
खुद गीता में कहता है तेरा भगवान मेरे यार |

औरों के वादे कसमें सब भुला दो लेकिन, 
करो याद खुद से खुद का पैमान मेरे यार |


सोमवार, 30 जनवरी 2012

अभी हारा नहीं हूँ मैं..


बेशक हार हुयी है मेरी
पर हारा नहीं हूँ मैं
मुझको लाचार न समझो तुम
बेचारा नहीं हूँ मैं
रुका हूँ, गिरा हूँ, ज़मीं पर पड़ा हूँ
पर ज़िंदा हूँ अभी,
किस्मत का मारा नहीं हूँ मैं
फिर उठूँगा, बढ़ूँगा,
फ़लक तक चढ़ूँगा
मैं  सूरज हूँ,
उगना ढलना आदत है मेरी
टूट के पल में  खो जाये
वो तारा नहीं हूँ मैं
बेशक हार हुयी है मेरी
पर अभी हारा नहीं हूँ मैं.....

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

ज़िंदगी का कुआँ



जाने क्यों तुम इसे 
मौत का कुआं कहते हो
मेरे लिए तो इसका हर ज़र्रा
ज़िंदगी से बना है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

जैसे ज़िंदगी हमें
गोल गोल नचाती है 
वैसे मेरी मोटर भी 
चक्करों मे चलती है
रंग बदलता है जीवन 
नित नए जैसे
वैसे ही ये अपने
गियर बदलती है
ध्यान भटकने देना 
दोनों जगह मना है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

रफ्तार सफलता की
ऊपर ले जाती है 
और आकांक्षा गुरुत्व है 
संतुलन उस से ही है
यहाँ टिकता वही है
जो सामंजस्य बना चला है
कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

छोड़ो इन बातों को
ये सब तो बस बातें है
कभी आओ मेरे घर
मेरा घर देखो
इस कुयेँ के कारण ही
आज वहाँ भोजन बना है 
फिर कैसे कहते हो तुम
कि ये मौत का कुआँ है

कभी ध्यान से देखो 
ये ज़िंदगी का कुआँ है

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

कहानी :अन्ना और कांग्रेस

                              एक समय की बात है, कहीं दूर एक "भारत" नाम की बगिया थी | बगिया में २८ बड़े और ७ छोटे, कुल मिलाकर ३५ पेड़-पौधे थे | बहुत सुन्दर बगिया थी वो |  हर पेड़ पर ढेर सारे घोसले थे जिनमे तरह-तरह के पक्षी रहते थे | वो सब पक्षी दिन भर मेहनत करके अपने बच्चों के लिए दाना लाते थे | सब बिलकुल सुखपूर्वक रह रहे थे |                                         एक दिन वहां "कांग्रेस" नाम का एक कुत्ता आया | वो बहुत भूखा और कमज़ोर था | उसने पक्षियों से भोजन माँगा | पक्षियों को दया आ गयी | उन्होंने उसे अपने बच्चो के लिए लाये हुए भोजन  में से कुछ  खाने को दे दिया | कुत्ता भोजन करके बहुत प्रसन्न हुआ | उसने पक्षियों से कहा, "आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद | आपने मेरा जीवन बचाया है | मुझे आप अपना एहसान चुकाने का एक अवसर दें |"
      पक्षी कुत्ते के आत्मसम्मान की भावना से बड़े प्रभावित हुए | उन्होंने कुत्ते से कहा, " तुम हमारे लिए एक काम कर सकते हो | हम सभी पक्षी पूरे दिन भोजन की तलाश में बाहर रहते है| हमारे बच्चे और अंडे यहाँ घोसलों में असुरक्षित रहते है | तुम इनकी यहाँ रहकर सुरक्षा करो, बदले में हम तुम्हे रोज़ भोजन दिया करेंगे |"
              कुत्ता ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गया | पक्षी अगले दिन से निश्चिंत होकर भोजन की खोज में जाने लगे | वे शाम को लौट कर कुत्ते को भोजन देते | सब कुछ इसी प्रकार कुछ दिनों तक चलता रहा | किन्तु एक शाम जब पक्षी वापस लौटे तो उनके घोसलों से कुछ अंडे गायब थे | पक्षियों ने कुत्ते से पूछा तो,"आज आप लोगों के जाने के सांप आया था उसने कुछ अंडे खा लिए, मुझे इस बात का अत्यंत खेद है किन्तु अब चिंता की कोई बात नहीं है | मैंने उस सांप को भगा दिया है | वह अब यहाँ आने की हिम्मत कभी नहीं करेगा |"
पक्षी कुत्ते की बहादुरी की प्रशंसा करते हुए अपने अपने घोसलों में लौट गए | लेकिन अब ऐसी  घटनाएँ रोज़ होने लगी | सारे पक्षी बहुत परेशान थे | तभी अन्ना नाम वाले बूढ़े बुद्धिमान कबूतर ने एक उपाय सुझाया | उसने कहा," हम सब लोग जब यहाँ से चले जाते हैं फिर यहाँ क्या होता है हमे नहीं पता| इसलिए अब से हम में से कोई  एक पक्षी लोकपाल बनेगा और यहाँ रह कर निगरानी करेगा | " अगले दिन से एक पक्षी रुक कर निगरानी करने लगा तो यह पाया की कांग्रेस ही उनके अण्डों को खा रहा थी | लोकपाल ने यह बात सभी पक्षियों का यह बात बताई तो वो गुस्से से कांग्रेस पर हमला करने जाने लगे | अन्ना ने उन्हें रोका और कहा," हमे यह सब शान्ति पूर्ण ढंग से करना चाहिए | हम शांति से कांग्रेस को यहाँ से जाने के लिए कहेंगे |" 
                        सारे पक्षी कांग्रेस के पास गए और अन्ना ने उसे उसके कुकृत्य के बारे में बताते हुए वहाँ से निकल जाने को कहा | हडबडाहट और भय में कांग्रेस ने अन्ना पर हमला करके उसे निगल लिया | बाकी सभी पक्षी यह देखकर गुस्से में कांग्रेस पर चोंच मारने लगे | उधर अन्ना भी पेट के अन्दर चोंच मारने लगा | कुत्ते ने अन्ना को उगलना चाहा लेकिन अन्ना जान गया था कि वह अन्दर से ज्यादा चोट पहुंचा सकता है | उसने अपने पंजे अन्दर ही गड़ा दिए और चोंच मारता रहा |  इस तरह कांग्रेस मर गया और अन्ना पेट फाड़कर बाहर आ गया |


(अब देखना यह है कि इस कांग्रेस नाम के भेड़िये का पेट कब फटता है |) 

शनिवार, 6 अगस्त 2011

प्रीत कहाँ??



कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ?

सुनते है सब रोज़ ग़ज़ल 
गीत कहाँ ? अरे गीत कहाँ ??

जलते हैं चराग अब हर घर में 
पर दीप कहाँ ?? अरे दीप कहाँ ??

छिड़ते है राग सभी दिल में 
संगीत कहाँ ?? संगीत कहाँ ??

गुलजार गुलिस्तान होता है
पर फूल यहाँ पर रोता है, 

सब जीते है दुनिया की ख़ुशी 
पर जीत कहाँ?? अरे जीत कहाँ??

मिलते है सभी दुनिया में मगर
अब मीत कहाँ?? अरे मीत कहाँ ??

कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ??

शनिवार, 23 जुलाई 2011

दिनचर्या

सुबह सवेरे रोज़ अँधेरे, 
उठ कर हो गया तंग |
नहीं जागना नहीं  भागना,  
चाहे जो हो दंग |

चाहे जो हो दंग,
अंग में पीड़ा होती |
न जाना होता तो, 
दिन भर क्रीडा होती |

क्रीडा होती मस्त,
गस्त करते हम दिन भर |
दिन से होती साँझ,
और हम सोते जी भर |

सोते जी भर यूँ कि,
जैसे मदिरा पी हो |
सपने में आती इक नारी ,
सुंदर सी जो |

सुंदर सी जो नार मिले, 
तो ब्याह रचाता |
नहीं छोड़ता  जीवन भर,
और साथ निभाता |

साथ निभाता इस से पहले
टुट गयी निंदिया |
घड़ी का कांटा एक तरफ, 
एक तरफ थी खटिया |

रविवार, 17 जुलाई 2011

लोग

मुझसे मिलते ही मुझे सीने से लगा लेते हैं लोग
मेरी हर ग़ज़ल को होंठों पे सजा लेते हैं लोग
पर इन लोगों की याददाश्त है कमज़ोर बड़ी
मेरे पलटते ही मुझे दिल से भुला देते हैं लोग

अब तो वफ़ा की उम्मीद भी गफलत ही है
कहाँ किसी को वफ़ा के बदले वफ़ा देते हैं लोग

उजले बदन वालों के दिलों में घुप अँधेरा है
ज़मीर-ओ-जज़्बात के चराग बुझा देते है लोग

हबीबों और रकीबो की पहचान कैसे हो
नकाबों पे भी कई नकाब लगा लेते हैं लोग

है ये प्यार की दुनिया, है यहाँ प्यार बहुत
कि बड़े प्यार से प्यार को दग़ा देते हैं लोग

ऐसे लोगों को कैसे समझाओगे 'विक्रम '
ज़रा सी बात पे ही लाशें बिछा देते हैं लोग |

मुझसे मिलते ही मुझे...........

शनिवार, 5 मार्च 2011

"अल्लाह मालिक"

इक दिन कहा था तुमने ही 
कि ये मुल्क चमन होगा |
और ये भी कहा था तुमने शायद 
इसमें सुकून-ओ-अमन होगा |
अभी ऐसा कुछ तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

इक दिन कहा था तुमने ही 
की माँऐं रातो को न रोयेंगी |
और वादा किया था कि औलादें अब 
कभी खाली पेट न सोयेंगी |
अभी ऐसा भी तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

इक दिन कहा था तुमने ये भी कि 
अब नहीं मरेगा कोई नत्था 
और भरोसा दिलाया था हमको
के दागी न पायेंगे सत्ता 
अभी ऐसा भी तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

उस दिन कहा था मैंने भी
 कि ये दिन इक दिन तो बदलेंगे
तुमको उखाड़ फेकने को
लोग सडकों पर निकलेंगे
 अब ऐसा जब हो रहा है तो
तेरा क्या हो "अल्लाह मालिक"

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

पंख

खुले गगन में, वन उपवन में
अब जाने को दिल करता है
बंधन तोड़ के, सब कुछ छोड़ के
उड़ जाने को दिल करता है |
दिल करता है संग हवा के 
 दूर कहीं मैं बह जाऊं 
दिल करता है फिर न लौटूं 
वहीँ कहीं मैं रह जाऊं 
कटी पतंग सा दिल की उमंग सा  
हवा में गोते मैं खाऊँ
फिर न आऊँ कभी ज़मीन पर
रहूँ हवा में इतराऊँ
पर इक इक करके इतने दिन से
चुन चुन के जो जोड़े हैं
अब याद नहीं आता है
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं

याद नहीं आता है 
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं


शनिवार, 27 नवंबर 2010

वो पागल है ?

क्या वो पागल है, जो बेवजह मुस्कुराता है ?
पागल ही है, तभी सरे राह गुनगुनाता है |
अपनी ही धुन में वो गली गली घूमता है |
राह चलते जानवरों को तो कोई पागल ही चूमता है |
वो राहगीर है, उसका कोई घर बार बही है |
उसे किसी का, किसी को उसका इंतजार नहीं है |
बिना खाए पिए भी दिन रात मुस्कुराता है |
ऐसे ही इंसान को तो पागल कहा जाता है |
क्या वो पागल है........

हर तरफ आग है, है हर ओर बस नफरत का धुंआ,
एक दूजे कि जाँ ले रहे हैं हिन्दू मुसलमाँ |
पर उसे फर्क नहीं, वो तो मुस्कुराता है |
जलते चौराहों पर वो नाचता और गाता है |
खिड़की से देख उसे, मैं घबराता हूँ |
दरवाजा खोल, दौड़ उसके पास जाता हूँ |

पूँछता हूँ की क्यों खुश है ? कैसा इंसान है तू ?
ये बता हिन्दू है या कि मुसलमान है तू ?
ये सुनकर के वो और मुस्कुराता है ,
जवाब देकर वो हँसता और आगे बढ़ जाता है |
कहता है- "ना मै हिन्दू हूँ, ना हूँ मुसलमान मै |
 इन वहशियों कि बस्ती में हूँ इकलौता इंसान मैं |
  ये सब हो गए हैं देखो ना बिलकुल पागल |"
इतना कहकर के बढ़ गया आगे वो पागल |
उसको सुन कर के मैं सोच में पड़ जाता हूँ ,
"कौन पागल है ?" खुद से पूँछता लौट आता हूँ....

"कौन पागल है ?".......

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

रिश्ते


दिल करता है अब हम रो दें,
बाँध तोड़ दें, जंहाँ डुबो दें |
चीख चीख कर सबसे कह दें,
बस बहुत हुआ, अब और नहीं |
रिश्ते इंसानों के और नहीं |

ये वो इंसान हैं, जो लड़ते हैं,
जाति धरम पर, क्रिया करम पर,
सच्चे झूठे मिथक भरम पर |
कब, क्यूँ, किससे लड़ ले ठौर नहीं |
बस बहुत हुआ, अब और नहीं |
रिश्ते इंसानों के और नहीं |

 ये वो इंसान हैं, जो लड़ते हैं,
कभी मज़हब पर, कभी सरहद पर,
तो कभी दूसरे की बरक़त पर |
इनके रिश्तों को अब खो दें |
दिल करता है अब हम रो दें |

दिल करता है अब हम रो दें |

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

नसीब

अभी शब् है के कोई ख्वाब सहेजें आओ |
अपनी सुबह को हसीं और भी कर दे आओ |
लम्हे खुशियों के जो बिखरे है आज |
उन्ही लम्हों को फिर से समेटें आओ |
अभी शब् है......

रात काली है मगर चांदनी की तो है आस |
हमको कुछ देर भी हुई तो है आज |
सुबह भूले थे मगर शाम को लौटें आओ |
अभी शब् है.....

बस करो अब अपने नसीब पर रोना |
न कहो के होगा वही जो है होना |
अपनी किस्मत को अपने हाँथ से लिख दें आओ |
अभी शब् है......

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

तलाश


चल पड़ा हूँ इक सफ़र पर,
एक अनजानी डगर पर |
मजिल पता है, कि जाना कहाँ है |
पर रास्ता नहीं, वो कहीं खो गया है |
वो मंजिल मैं अब हर डगर ढूँढता हूँ |
कभी तो मिलेगी, अगर ढूँढता हूँ |

जज्बों में हिम्मत, इरादे बड़े हैं |
मगर राह में ऊंचे पर्वत खड़े हैं |
इन्हें पार करना भी मुश्किल बड़ा है |
मगर अब ये बंद भी जिद पे अड़ा है|
इन्हें लांघने का सबब ढूँढता हूँ |
कभी तो मिलेगा अगर ढूँढता हूँ |

किसी कि दुआएं मेरे साथ भी हैं|
कुछ संग चलते मेरे आज भी हैं |
कह नहीं सकता कि कब तक रहेंगे |
परिवर्तन कि धारा में ये भी बहेंगे |
फिर भी अंजाम से बेखबर ढूंढता हूँ |

कभी तो........ 

बुधवार, 3 नवंबर 2010

दोस्त

दोस्त पाए हैं बहुत दोस्ती पाई नहीं
दोस्तों की भीड़ में तन्हाईयाँ छाई रही
चल पड़े थे इक सफ़र पर  दोस्तों के संग हम
आगे-आगे हम चले तो
दोस्त बोले, ''हैं पीछे ही हम''
ठोकर लगी तो पीछे देखा,  तो दिखा कोई नहीं.
दोस्त पाए हैं बहुत दोस्ती पाई नहीं
दोस्तों की भीड़ में तन्हाईयाँ छाई रही

ऐ ज़िन्दगी! तू भी कभी  यूँ रहम से तो काम ले
लडखड़ाऊँ मैं तो कोई  दोस्त आकर थाम ले
ज़िन्दगी तू ऐसा मंज़र  क्यों कभी लायी नहीं
दोस्त पाए हैं बहुत दोस्ती पाई नहीं
दोस्तों की भीड़ में तन्हाईयाँ छाई रही

वहाँ अब घर नहीं बसते

वहाँ अब घर नहीं बसते, बस मकान रहते हैं |
नहीं बनते वहाँ कुनबे, बस संग कुछ इंसान रहते हैं |
वहाँ बाबूजी की डांट, माँ का प्यार नहीं है अब,
हर शाम बेटे का माँ को इंतज़ार नहीं है अब |
खाने की मेज पर वहाँ अब बतकही नहीं होती,
ये सब बातें तो शायद अब कहीं नहीं होती |
रिमोट की ख़ातिर वहाँ अब कोई नहीं लड़ता |
अमरुद की टहनी पर वहाँ कोई नहीं चढ़ता |
देर से आने पर अब कोई कुछ नहीं पूँछता |
दोस्तों संग बाहर जाने से पहले कोई कुछ नहीं सोचता |
वहाँ लोग दर्द और जज्बातों से बेदाग़ रहते हैं |
वहाँ अब दिल नहीं रहते बस दिमाग रहते हैं |

वहीँ कई मकानों के बीच मेरा भी घर रहता था,
पर अब नहीं, वो भी मकान बन गया है |
ना जाने क्या था और क्या अब हर इंसान बन गया है ?
वहाँ संग रह कर भी लोग एक दूजे से हो अनजान रहते है |
वहाँ अब घर नहीं बसते, बस मकान रहते हैं |

वहाँ अब घर नहीं बसते, बस मकान रहते हैं |

दूरियाँ

दूर दूर रह के कभी पास चले आओ,
जिसे हम भी गुनगुनाये ऐसा गीत कोई गाओ |
बीते पलों के पन्ने चलो साथ साथ खोलें,
हम अपनी बताएं तुम भी अपनी सुनाओ|
दूर-दूर रह के........

हम फातिया करें तुम भागवत कराओ |
हम आयतें पढ़ें तुम चालिसे गाओ |
धर्म, कौम को कुछ पीछे छोड़कर,
अबके हम ईदी बाँटें तुम भंडारे कराओ |
दूर-दूर रह के........

दूर-दूर रह के कुछ यूँ जलसे मनाओ,
हम नात गायें तुम फगुआ गुनगुनाओ |
चलो हमसफ़र अबके कुछ यूँ करें,
की हम सेवइयां पकाएं तुम गुझिया बनाओ |
दूर-दूर रह के........

सरहदों की जगह कोई गुल्स्तां बसाओ,
हम कांटे हटायें तुम फूल उगाओ |
हवाओं संग उड़ के मिलने आयें हम तुम,
हम पुरवाई संग आयें तुम पछुआ संग आओ |
दूर-दूर रह के कभी दूरियाँ मिटाओ,
जिस्म जुदा ही सही दिल से दिल तो मिलाओ |
दूर-दूर रह के........

दूर दूर रह के कभी पास चले आओ........

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