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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

बे-बहर ग़ज़ल



इजहार-ए-इश्क़ तो दोनों ने किया था
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया

इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया


ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया


कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया


मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"


तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया

बुधवार, 23 जनवरी 2013

खुशबू


तुम तो यहीं थी 
मेरे भीतर
एक खुशबू की तरह 

मुझे महकाती हुयी 
और मैं पागल 

ढूँढता रहा तुम्हें बाहर 
कस्तूरी मृग की तरह 


पर तुम चुप क्यूँ रही?

कुछ तो कहती

डांट ही देती मुझे
मेरी मूर्खता पर
या आनंद आता है
मुझे सताने मे 
यही बता दो अब



क्या मेरे कष्ट

मेरे दुख देख 

तुम्हें पीड़ा न हुयी
नहीं लगा तुम्हें 
प्रेम की खुशबू 
काफी नहीं है 
सहारा चाहिए था मुझे?



नहीं लगा यदि 

ऐसा कुछ तुमको 

तो फिर अब मुझमे 
बस कर नहीं कोई लाभ
छोड़ दो मुझे 
मेरे हाल पर
ले लो अपनी खुशबू 
मुझे महकने दो अब 
मेरी तरह


...........

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

तलाश

फिरता है क्यूँ गली में, क्यूँ भटकता है दर-ब-दर |
हर सू यही सवाल है, यही पूंछे है हर नज़र |
मेरा यही जवाब है, यही बात बोलता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

कल थी जो साथ, पर छिन गयी उनकी गली में |
अपने लबों की खोयी वो मुस्कान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

उनकी उठे मुझ पर भी इनायत की इक नज़र |
उनकी हसीं आँखों का वो एहसान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

 उड़ा ले जाए मेरी गमीं को जो दूर बहुत दूर |
मै उनकी चाहतों के वो तूफ़ान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

 है दूर मगर फिर भी मेरे दिल से जुदा नहीं,
 मेरे दिल के कमरे का वो मेहमान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

सामने बिठा के मैं कर सकूँ उनका भी सजदा,
सालों से मै बस वो इक रमजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

खुद से हूँ बेखबर, नहीं दुनिया का कुछ पता,
 अपने हश्र और हाल से अनजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

तलाश


चल पड़ा हूँ इक सफ़र पर,
एक अनजानी डगर पर |
मजिल पता है, कि जाना कहाँ है |
पर रास्ता नहीं, वो कहीं खो गया है |
वो मंजिल मैं अब हर डगर ढूँढता हूँ |
कभी तो मिलेगी, अगर ढूँढता हूँ |

जज्बों में हिम्मत, इरादे बड़े हैं |
मगर राह में ऊंचे पर्वत खड़े हैं |
इन्हें पार करना भी मुश्किल बड़ा है |
मगर अब ये बंद भी जिद पे अड़ा है|
इन्हें लांघने का सबब ढूँढता हूँ |
कभी तो मिलेगा अगर ढूँढता हूँ |

किसी कि दुआएं मेरे साथ भी हैं|
कुछ संग चलते मेरे आज भी हैं |
कह नहीं सकता कि कब तक रहेंगे |
परिवर्तन कि धारा में ये भी बहेंगे |
फिर भी अंजाम से बेखबर ढूंढता हूँ |

कभी तो........ 

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