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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

बे-बहर ग़ज़ल



इजहार-ए-इश्क़ तो दोनों ने किया था
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया

इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया


ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया


कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया


मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"


तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

दस्तूर



तुझे भूलना मुमकिन भी हो जाता लेकिन 
तेरी याद दिलाने का जहां में दस्तूर बहुत है

न की कद्र तेरी जब थी जानाँ पास तू मेरे 
आज जब कद्र करता हूँ तो तू दूर बहुत है

हमारा इश्क ग़र परवान चढ़ता तो क्यूँ कर
मैं मगरूर बहुत हूँ और तू मजबूर  बहुत है   

सैकड़ो ज़ख्म सह कर भी जी लेता है इंसान 
मगर जाँ लेने को दिल पे इक नासूर बहुत है 

ठुकरा दिया "विक्रम" जिसे वो फिर न मिलेगा 
जहां में किस्सा ये चाहत का मशहूर बहुत है
  

रविवार, 14 अगस्त 2011

जलन



ढूद्ती रहती है नज़रें हर घडी उनको ,
सहर से शाम तलक याद करें हम उनको | 
वो काश मेरे होते तो गम कैसा,
न मिले तो दिल पर क्या बीतेगी क्या पता उनको 


                                   सांझ की दहलीज पर  दिखा  रौशनी सा है,
                                    जाने दिल है जला या जला है दिया |
                                    जलन की आग सुलग रही है ऐसे,
                                     कितने सपने जला गई क्या पता उनको|

शनिवार, 13 अगस्त 2011

बचपन की याद.....


है सावन की बरसात याद
है बचपन की हर बात याद 
जब काले बादल होते थे 
घनघोर घटा भी बरसी थी 
उस बारिश में हम भीगे थे
उन बूंदों को भी पकडे थे
फिर कागज़ की नाव बनाकर 
बारिश में दूर बहाते थे
उस नाव के पीछे-पीछे
कुछ दूर निकल भी जाते थे
जब कीचड़ में थे पैर पड़े 
गिरते-थमते गिर जाते थे
है  सावन की बरसात याद
है बचपन की  हर बात याद

तब के दिन थे कितने अच्छे 
 सारे अपने थे कितने सच्चे 
 अब तो दुनिया भी झूटी है
  हर एक को फरेब ने लूटी है
  जब बड़े हुए तो पता चला 
  थे दुनिया से अनजान भला 
   बचपन में न चिंता थी
   अपनी न कोई निंदा थी 
  वो रात सुहानी होती थी 
  माँ की लोरी सुनती थी
  फिर नींद की रानी  आती थी 
 सपनो का महल सजाती थी 
  न ऐसी रात कभी आई 
  न नींद की रानी फिर आई
 वो  सपने अपने टूट गए   
वो सच्चे सारे छूट गए 
 बारिश वो सहसा थम गयी
बस बचा  रहा तो वही डगर 
बस बचा  रहा तो वही शहर 
वो ख़ुशी कही अब रही नही 
बस बची रही तो याद वही 
बस बची रही तो याद वही....

है बारिश  की वो बात याद
है बचपन की हर बात याद...

सोमवार, 25 जुलाई 2011

ऐ खुदा...क्यूँ ???


ऐ खुदा! तेरी ये दुनिया यूँ बदलती क्यूँ है??
 जिनसे गुजरे थे कल, वो राहें फिर से न गुजरती क्यूँ हैं??
ये जो गलियाँ हैं लगाती थी बचपन में दौड़ हमसे 
आज अजनबियों सी खड़ी हमें यूँ तकती क्यूँ हैं??
ऐ खुदा....

अपनी गोदी में ले मुझको सुलाती थी जो,
पत्ते टकराकर मीठी लोरी सुनाती थी जो,
जो मेरे बालो में हाथ फेरकर सहलाती थी 
बूढ़े पीपल से वो हवा मस्त न चलती क्यूँ है |
ऐ खुदा....

वो गौरैया जो छप्पर में थी अंडे देती 
अपने बच्चों को खुद लाकर थी दाने देती 
जो जगाती थी मुझे हर सुबह चीं-चीं करके 
मेरे आँगन में वो अब न चहकती क्यूँ है ??
ऐ खुदा ....  

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