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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

इंतज़ार


दरवाजा खुला रखो, इंतज़ार करो 
कभी किसी मुसाफिर से प्यार करो

कलियों ! आज ज़रा देर से खिलो
प्यासे भँवरे को और बेक़रार करो 

तनहाई में कमरे से भी बात करो
कभी दीवारों को अपना राज़दार करो 

तुम्हारी नफरत से मैं नहीं डरने वाला 
रास्ता अब कोई और इख्तियार करो 

बुत-ए-पत्थर का अब भरम छोड़ो 
आओ सजदा-ए-दिल-ए-यार करो

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मिलन........कैसे??

दिल में जगे जज़्बात, 
दबाऊं कैसे?? 
होंठों पे आई बात,
छुपाऊँ कैसे??

हर शाम जहाँ जाता,
और रात था बिताता  
उस मय के दर-ओ-राह को 
भुलाऊँ कैसे ??
कोसा तो मैंने खूब 
ख़ुद को ख़ुदी में ख़ुद से 
पर चाह कर भी मालिक,ख़ुद को 
मिटाऊं कैसे ??

वो थी सदा-ए-जन्नत 
माँगा उसे दुआ में 
इंसान मैं, परी वो, जोड़ी
बनाऊं कैसे ??

दिल में जगे जज़्बात,
आखिर..........दबाऊं कैसे??

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