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शुक्रवार, 1 मार्च 2013
रविवार, 24 फ़रवरी 2013
बे-बहर ग़ज़ल
इजहार-ए-इश्क़ तो दोनों ने किया था
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया
इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया
ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया
कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया
मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"
तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया
वो भी बदल गयी मैं भी मुकर गया
इक अज़ीज़ दोस्त था दिल के करीब था
मुसीबत के वक़्त में जाने किधर गया
ढूंढती रही नज़रे तुझको ही चारो ओर
नज़र को नहीं मिला, नज़र से उतर गया
कोई दर्द ही दे दे मुझे महसूस करने को
ये तो पता चले कि हूँ ज़िंदा कि मर गया
मज़मून ग़ज़ल का वो कभी जान न पाये
बस कहते रहे "हर शेर तेरा बे-बहर गया"
तस्कीं तुम्हें देने न आएगा कोई विक्रम
बधाई उन्हे देने को है सारा शहर गया
मंगलवार, 18 दिसंबर 2012
विक्रम
जो कोई पूछता है, कैसा तू इंसान है विक्रम
कभी शैतान है विक्रम कभी भगवान है विक्रम
वो कहते है समझ पाना तुझे मुश्किल बड़ा है यार
तू दिल से दिल मिलाकर देख बड़ा आसान है विक्रम
है मौसम सा मिजाज इसका पल भर मे बदलता है
कभी है जान-ए-महफिल तो कभी बेजान है विक्रम
बुरा न मानिए साहिब इसकी गफलतों का कुछ
चला जाएगा, पल दो पल का बस मेहमान है विक्रम
है इससे ताल्लुक क्या आपका न सोचिए साहिब
है सबसे आशना बस खुद से ही अंजान है विक्रम
रविवार, 25 मार्च 2012
ख़ता
उसकी इस ख़ता की भी कोई सज़ा नहीं
मिलने का किया वादा पर वो मिला नहीं
वो हसीं बात आज उसने ही बोल दी यारो
जो मेरे दिल मे थी मैंने मगर कहा नहीं
हाल-ए-दिल खत में तुझे तो मैंने रोज़ लिखा
क़ासिद को खत दिया पर तेरा पता लिखा नहीं
मेरी खता है जो छूना तुझे चाहूँ मैं मगर
इतना हसीं है तू, क्या तेरी कोई खता नहीं ?
मुझपे पहला पत्थर किसी अपने ने उछाला था
और तो गैर थे मुझे उनसे कोई गिला नहीं
इन अमीरों के आगे हाथ क्यूँ फैलाये "विक्रम"
ये भी तो इंसान हैं साहब, कोई खुदा नहीं
रविवार, 18 मार्च 2012
सफ़र
हयात-ए-ग़म का ये सफर नहीं आसान मेरे यार,
यहाँ आएंगे अभी और भी तूफान मेरे यार |
ज़रा सी तीरगी से हो गए हो हिरासान मेरे यार,
ज़िंदगी है ये तारीकियों का उनवान मेरे यार |
लड़ना मुश्किलों से है हर इंसान की किस्मत,
इनसे मोड़ ले जो मुंह वो क्या इंसान मेरे यार??
आधे रास्ते से हारकर तुम लौट जाओगे ??
इस कदर न बनो तुम नादान मेरे यार |
कुछ पल ठहर तू, सांस ले फिर बढ़ा चल आगे
थक जाये गर तू सफर के दौरान मेरे यार
मौत तो आनी है, इससे डरता क्यूँ है तू ?
मौत आज़ादी और है ज़िंदगी ज़िंदान मेरे यार |
तू कर्म करता जा और न फल की चिंता कर,
खुद गीता में कहता है तेरा भगवान मेरे यार |
औरों के वादे कसमें सब भुला दो लेकिन,
करो याद खुद से खुद का पैमान मेरे यार |
शनिवार, 19 नवंबर 2011
हक़
हुस्न की धूप, प्यार की बयार दे दो तुम,
ऐ खुदा ! वो सुबह एक बार दे दो तुम ।
उसको पाकर ही मेरे दिल को चैन आएगा
मेरा सुकून वो मेरा करार दे दो तुम
शहर फिजूल है, ये शहर अपने पास रखो
इंतेजा है कि बस कूचा-ए-यार दे दो तुम
बड़े दिनों के हैं ताल्लुकात तेरे मेरे
दोस्ती निभाओ, अमां यार दे दो तुम
मेरे जीने का फैसला तुझे ही करना है
मुझे घर दो चाहे मज़ार दे दो तुम
मेरा हक़ है जो मांगा है मैंने तुझसे खुदा
मैंने कब मांगा के मुझको उधार दे दो तुम
शनिवार, 12 नवंबर 2011
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011
प्यार
मैं तो कलाम-ए-इश्क़ का व्यापार करता हूँ
खुद भी बीमार हूँ, सबको बीमार करता हूँ
मुझको दे जाता है वो शख्स हमेशा ही धोखा
फिर भी भरोसा मैं उसका बार-बार करता हूँ
देगी तू मौत मुझे इक तो दिन थक करके
ज़िंदगी इतना तो तुझपे एतबार करता हूँ
मेरा जनाज़ा न उठाओ उनको ज़रा आने दो
दो घड़ी और रुक के उनका इंतज़ार करता हूँ
वो पूछते हैं, "प्यार करते हो कितना हमसे "
कम ही होगा जो कहूँ बेशुमार करता हूँ
कैसे मैं छोड़ दूँ घर बार सब तेरी खातिर
तुझसे ही नहीं माँ से भी प्यार करता हूँ
बुधवार, 14 सितंबर 2011
हमसफ़र
बस दो कदम और साथ आओ तो सही
साथ चलने का वादा निभाओ तो सही
तुम ही कहते थे चलोगे साथ मेरे सदा
और कहते थे "कभी आजमाओ तो सही"
इतना बड़ा सफ़र देखो बातों में कट गया
चुप न रहो, गीत कोई सुनाओ तो सही
रूठ कर मुँह न फेरो ऐ मेरे हमसफ़र
हुई है क्या खता ये बताओ तो सही
था ये मुश्किल सफ़र, राह थी बड़ी कठिन
सामने है अब मंज़िल, मुस्कुराओ तो सही
हो जायेगा "विक्रम" आसान हर सफ़र
कोई हाथ हाथों में लेकर कदम बढाओ तो सही
शुक्रवार, 12 अगस्त 2011
आज बारिश में......
थोड़ी देर और ठहर जाओ, आज बारिश में
जैसे ये बूँदें समायीं थीं बादलों में अब तक
वैसे तुम मुझ में समां जाओ, आज बारिश में |
थाम लो हाथ मेरा, ज़रा देर मेरे संग चलो
दो कदम साथ निभाओ, आज बारिश में
जैसे ज़मीं की प्यास बुझा दी है बादलो ने आकर
मेरे दिल की भी आग बुझाओ, आज बारिश में |
जलती शबनम को होंठों से लगाने की है ख्वाहिश मेरी
आग से आग बुझाओ , आज बारिश में
अब लाज-ओ-हया की अदा बहुत हुयी
सनम अब और न शरमाओ, आज बारिश में
हमें छोड़ कर न कहीं जाओ, आज बारिश में
थोड़ी देर और ठहर जाओ, आज बारिश में |
शनिवार, 23 जुलाई 2011
मिलन........कैसे??
दिल में जगे जज़्बात,
दबाऊं कैसे??
होंठों पे आई बात,
छुपाऊँ कैसे??
हर शाम जहाँ जाता,
और रात था बिताता
उस मय के दर-ओ-राह को
भुलाऊँ कैसे ??
कोसा तो मैंने खूब
ख़ुद को ख़ुदी में ख़ुद से
पर चाह कर भी मालिक,ख़ुद को
मिटाऊं कैसे ??
वो थी सदा-ए-जन्नत
माँगा उसे दुआ में
इंसान मैं, परी वो, जोड़ी
बनाऊं कैसे ??
दिल में जगे जज़्बात,
आखिर..........दबाऊं कैसे??
रविवार, 17 जुलाई 2011
लोग
मुझसे मिलते ही मुझे सीने से लगा लेते हैं लोग
मेरी हर ग़ज़ल को होंठों पे सजा लेते हैं लोग
पर इन लोगों की याददाश्त है कमज़ोर बड़ी
मेरे पलटते ही मुझे दिल से भुला देते हैं लोग
अब तो वफ़ा की उम्मीद भी गफलत ही है
कहाँ किसी को वफ़ा के बदले वफ़ा देते हैं लोग
उजले बदन वालों के दिलों में घुप अँधेरा है
ज़मीर-ओ-जज़्बात के चराग बुझा देते है लोग
हबीबों और रकीबो की पहचान कैसे हो
नकाबों पे भी कई नकाब लगा लेते हैं लोग
है ये प्यार की दुनिया, है यहाँ प्यार बहुत
कि बड़े प्यार से प्यार को दग़ा देते हैं लोग
ऐसे लोगों को कैसे समझाओगे 'विक्रम '
ज़रा सी बात पे ही लाशें बिछा देते हैं लोग |
मुझसे मिलते ही मुझे...........
मंगलवार, 12 जुलाई 2011
जवाब
कागज़ के पैमाने में उनकी 'हाँ' की शराब आ जाये
ये मेरा वीराना भी हो जायेगा इक दिन गुलशन,
बस इक बार यहाँ वो हसीं गुलाब आ जाए
वो गुजरे भी मेरी गली से तो, पर्दा करके
कभी तो चेहरा वो, नज़र बेनकाब आ जाए
चांदनी रातो में भी मेरी दुनिया अँधेरी है
कभी मेरी छत पे भी तो महताब आ जाये
मैं फ़कीर-ए-इश्क खड़ा हूँ कब से दर पे
इक बार तो बाहर वहाब आ जाये
ऐ खुदा ! इस बार तो मेरे ख़त का जवाब आ जाये |
सोमवार, 27 जून 2011
मैं क्या हूँ??
क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
झूठ होगा जो कहूँ प्यार का दरिया हूँ
इंसानियत का हुनर अभी आया नहीं मुझमे
और हैवानियत से भी अभी थोड़ा जुदा हूँ
क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
मैं हर दिन कुछ और बनके जिया हूँ
खुद की पहचान खो दी है मैंने
अपनी बहुत सी शाख्शियतो का आशियाँ हूँ
क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ
अपने टूटे ख़्वाबों का बाकी निशाँ हूँ
यूँ ही कुछ शेर लिख दिए हैं मैंने
उन्ही शेरों को हर पल में जी रहा हूँ
....
अब क्या कहूँ तुमसे कि मैं क्या हूँ????
सोमवार, 13 जून 2011
कुछ यूँ हो, कि गुफ्तगू हो
चलो कि फिर आज कुछ यूँ हो
हम हों तुम हो और थोड़ा जुनूँ हो |
ज़िन्दगी और मौत एक दूजे से भागी है बहुत
कुछ यूँ करो की दोनों एक दूजे से रू-ब-रु हों |
ज़िन्दगी के सफ़र में, मैं बातें करना भूल गया
आओ बैठो साथ ज़रा, कुछ देर गुफ्तगू हो |
मैंने शिकवे शिकायत तुम्हारे कभी सुने ही नहीं
पर छोडो उनकी बात भी, आज क्यूँ हो |
तेरे पहलू में गुज़र जाये ये रात-ए-खिज़ा
पर तेरा दामन है तो सुबह-ए-फिजा भी क्यूँ हो |
सुकून-ओ-दर्द की ज़िन्दगी से हूँ उकता सा गया
चलो कहीं ऐसी जगह के जहाँ न दर्द न सुकूँ हो |
चलो की फिर आज कुछ यूँ हो
हम हों तुम हो और थोड़ा जुनूँ हो |
बुधवार, 4 मई 2011
ऐ दिल !
ऐ मेरे दिल तू ऐसा नहीं था कभी,
क्यूँ भला तू अचानक बदलने लगा है |
तू न मचला था यूँ तो पहले कभी,
जिस तरह आज कल तू मचलने लगा है |
तू धड़कता तो था पहले भी मगर,
यूँ नहीं जैसे अब तू धड़कने लगा है |
तेरी धडकनों में आई कहाँ से जुबाँ,
जो उनका नाम अब तू रटने लगा है |
ऐ मेरे दिल........
तू था मेरा वफादार और मेरा हमनशीं,
न जाने क्यूँ आज कल तू बहकने लगा है |
यूँ तो रहता है तू मेरे ही जिस्म में मगर,
क्यूँ उनकी ख़ुशबू में अब महकने लगा है |
तेरी सोहबत भी तो बुरी नहीं है
फिर भी जाने क्यूँ तू बिगड़ने लगा है |
मेरी भी कही एक सुनता नहीं,
मेरा हो के मुझसे ही झगड़ने लगा है |
ऐ मेरे दिल तू ऐसा नहीं था कभी,
क्यूँ भला तू अचानक बदलने लगा है |
शनिवार, 30 अप्रैल 2011
इंसान हूँ मैं !!
अपनी ही महफ़िल में खड़ा मेहमान सा हूँ मैं,
अपने इन हबीबों से भी तो हुआ अनजान सा हूँ मैं,
अरे लोगों न करो गलती मुझे जिंदा समझने की,
इस सीने के भीतर ज़रा बेजान सा हूँ मैं |
मेरे फ़न ने दीं जब से मुझे बदनामियाँ मेरी,
तन्हाँ कर गयी तब से मुझे तन्हाईयाँ मेरी.
हाँ हूँ शायर मैं लेकिन ज़रा ये भी तो सुन लो सब,
उनके शहर की गलियों में ज़रा बदनाम सा हूँ मैं |
मेरे इश्क ने मुझको दीवाना कर दिया ऐसा,
न रहा इस जहाँ में कोई पागल मेरे जैसा |
ए लोगों चलो माना ये भी के वहशी हूँ मैं लेकिन,
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |
अरे लोगों न करो गलती मुझे जिंदा समझने की,
इस सीने के भीतर ज़रा बेजान सा हूँ मैं |
मेरे फ़न ने दीं जब से मुझे बदनामियाँ मेरी,
तन्हाँ कर गयी तब से मुझे तन्हाईयाँ मेरी.
हाँ हूँ शायर मैं लेकिन ज़रा ये भी तो सुन लो सब,
उनके शहर की गलियों में ज़रा बदनाम सा हूँ मैं |
मेरे इश्क ने मुझको दीवाना कर दिया ऐसा,
न रहा इस जहाँ में कोई पागल मेरे जैसा |
ए लोगों चलो माना ये भी के वहशी हूँ मैं लेकिन,
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
मैं जिंदा हूँ ?
आज ज़िन्दा हूँ मैं फिर एक जमाने के बाद,
आये फिर याद मुझे वो, भूल जाने के बाद |
देके पल दो पल की ख़ुशी फिर वो लौट जायेंगे,
जो आज आये हैं सारी उम्र सताने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ......
करवटों में कटी रात, आँखों में थी नींद कहाँ
शमा बुझाई भी तो, सारी रात जलाने के बाद |
रात के संग हम भी जले इस क़दर,
राख़ भी ना मिली, हमको बुझाने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ........
रूठने का हुनर हमको भी आता है मगर,
खुद तड़पते हैं हम रूठ जाने के बाद |
उनके तेवर भी बदलते हैं मौसम की तरह,
खुद ही रूठ जायेंगे, वो हमको मनाने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ........
तन्हाई के दोज़ख में फिर वो मुझे छोड़ गए,
जन्नत-ए-इश्क के ख़्वाब दिखाने के बाद |
फिर ना आई मौत मुझे मर कर के भी,
आज जिंदा हूँ मै फिर मर जाने के बाद |
आज जिंदा हूँ मै फिर मर जाने के बाद |
(यह पोस्ट गलती से मिट गयी थी अतः पुनः पोस्ट कर रहा हूँ |)
मंगलवार, 30 नवंबर 2010
बेक़दर
वो क्या समझेंगे मेरी जुदाई की तड़प
जिनका अपना कभी उनसे जुदा ना हुआ |
माना उनको मैंने रब, उनका सजदा किया,
पर मैं कभी उनके दिल का खुदा ना हुआ |
पूंछते हैं वो " चाहोगे कब तक हमें?"
शायद क़र्ज़ दिल का जब तक अदा ना हुआ |
वो क्या समझेंगे........
हम तड़पते रहे इश्क में रात दिन,
पर उन्हें तरस हम पर ज़रा ना हुआ |
प्यास से मर गए बीच नदिया के हम,
आब का एक कतरा पर मेरा ना हुआ |
नहीं गुजरा कभी एक पल एक दिन,
ज़ख्म दिल का मेरे जब हरा ना हुआ |
वो क्या समझेंगे........
वो क्या समझेंगे मेरी जुदाई की तड़प
जिनका अपना कभी उनसे जुदा ना हुआ |
रविवार, 28 नवंबर 2010
सजा
मेरे दिल में शमा-ए-इश्क जला कर के चल दिए |
मेरे इश्क को गलत वो बता कर के चल दिए |
पहली नज़र में ही था हमें घायल कर दिया,
क्या फायदा कि अब जो नज़र झुका कर के चल दिए |
मेरे दिल में........
उन्हें हमसे नहीं है इश्क, है ये उनके दिल कि बात |
किसी और के है वो, समझते हैं हम उनके जज़्बात |
पर उम्मीद के सहारे हमें जीने का हक तो है |
क्या हक था उन्हें, जो उम्मीदों का महल गिरा कर के चल दिए |
मेरे दिल में........
मुझको अगर है इश्क तो, मेरी ख़ता है क्या ?
परवाने की मौत की कहो तुम ही वज़ह है क्या ?
शमा ने जलाया है उसे मानोगे ये तुम भी,
अपने गुनाह की हमको सजा सुना कर के चल दिए |
मेरे दिल में........
मेरे दिल में शमा-ए-इश्क जला कर के चल दिए |
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