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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कहानी : "रेत"

                उसके यूँ तो छमिया, छम्मकछल्लो, हरामजादी, रानी वगैरह कई नाम थे, मगर मुझे उसके नाम में कभी दिलचस्पी नहीं रही ...वो हर बार कुछ और बन जाती थी मेरे लिए.....और मैं इसीलिए उसके पास जाता था
वो मेरे लिए समंदर किनारे की रेत थी जब तक दिल किया उसके साथ खेला....... कुछ भी अपने मन का गढ़ा और फिर लात मार कर चल दिया
समंदर किनारे की रेत केवल दिल बहलाने के लिए होती है उसे कोई घर में नहीं सजाता और जब दिल बहल जाए तो हाथ झाड कर निकल जाते हैं....
मुझे उसके कौन सी बात पसंद थी या कौन सी बात नापसंद थी ये कहना मुश्किल है
कभी ध्यान नहीं दिया.....बस एक ही बात थी जो बहुत अजीब लगती थी.....अच्छी या बुरी में तौलने की कोशिश न करिए......बस अजीब....और वो ये की वो सीधे आँखों में देखती थी......एक टक...... बिना पलक झपकाए ........घूर कर नहीं.......बस यूँ की मुझमे कुछ खोज रही हो......या अपनी आँखों में मुझे कुछ दिखाने की कोशिश कर रही हो .....मुझमें उसे क्या दिखा क्या मिला मैंने कभी पुछा नहीं उसने कभी बताया नहीं
लेकिन मैंने कई बार उसकी आँख में अपना अक्स देखा है.....उसमे मैं अच्छा नहीं दिखा कभी.......हलाकि मेरे घर का आईना मुझे हमेशा खूबसूरत बताता है...लेकिन नहीं हमेशा कुछ काला सा दीखता था 

पर ये कहानी मेरी नहीं उसकी है....उसकी जिसका नाम मुझे नहीं पता.....
हर कहानी शुरू से शुरू होती है मगर उसकी कहानी की शुरुआत कब कहाँ कैसे और क्यूँ हुयी कोई नहीं जानता, वो बाज़ार में कब लायी गयी और कितनी बार बिकी किसी ने इसका हिसाब रखने की ज़रुरत नहीं समझी...... उसने खुद ने भी नहीं । मेरे लिए उसकी कहानी तब शुरू हुयी जब मैं उससे पहली बार मिला या यूँ कहूं की जब मैंने उसे पहली बार खरीदा या उसके शब्दों में मैंने पहली बार उसे भाड़े पे लिया ।
दलाल को बाहर पैसे देकर मैं कोठा नंबर 27 में दाखिल हुआ.....कोठे की जो इमेज दिमाग मे थी उससे काफी अलग थी वो जगह.......इस दस बाई दस कमरे की दीवरों पर हल्का हरा रंग लगाया गया था जो सीलन से कुछ हिस्सों में पपड़ी छोड़ रहा था......दरवाज़े से बिलकुल बगल एक मेज़ पर कुछ मेकप का सामान करीने से रखा था......उसके ठीक ऊपर दीवार पर एक छोटा आइना था....सामने दीवार पर दो तस्व्वेरें थी जिनमें किसी नेचुरल लैंडस्केप के ऊपर कोई अंग्रेजी सूक्ति लिखी थी......दाई और की दीवार पर एक खिड़की थी जो शायद ही कभी खुली थी......कमरे में घडी नहीं दिखी......बाहर दलाल लेकिन समय के हिसाब से पैसे ले रहा था........बिज़नस टैक्टिक्स!!......बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था....जो हलके कपडे के परदे से ढँक हुआ था.....मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ती या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी.....छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था.......पंखे से ठीक नीछे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी......चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे....
उसी चादर पर बैठी थी वो ......गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में.....मुस्कुराती हुयी
"आओ साहब.......क्या लोगे??"
यूँ तो ये सवाल काफी सीधा था मगर इसके जवाब कई हो सकते थे.......इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में बिताये हुए दो साल इतना तो सिखा चुके थे की हर बात कई मतलब लिए होती है और एक गलत जवाब आपका मजाक बना सकता था
"यहाँ लोग क्या लेने आते है"
"वो तो लेने वाले पे डिपेंड करता है.....मेरी तो भाड़े पर देने की दूकान है जो चाहो मिल जाएगा.....यहाँ कोई अपनी बीवी लेने आता है तो कोई माशूका किसी को फिल्मी हिरोइने चाहिए तो कोई रंडी की तलाश में यहाँ आता है तुम्हे क्या चाहिए भाड़े पे???
"एक रंडी के मुंह से इतनी फिलासफी अच्छी नहीं लगती"
"ह्म्म्म.....तो तुम्हे केवल रंडी चाहिए.....हाज़िर है"
उसके बाद उसने एक शब्द नहीं कहा......अब वो रेत मेरी थी.....अब मैं उसका क्या करूँ मेरी मर्ज़ी थी.... 
मैंने जी भर खेल कर वो रेत उसी बिस्तर पर बिखेर दी । 
धीरे धीरे मैं उसका नियमित ग्राहक बनता गया । सेक्स में ये अजीब सा गुण है आप जितना उसमे डूबते हो वो उतना ही और अन्दर खींचता है । पहले महीने में फिर दस दिन में और फिर हफ्ते में दो तीन बार मुझे उसकी ज़रुरत पड़ने लगी । अब हम थोड़ी बहुत बातें भी कर लेते थे। ज्यादातर वो बातें मेरे कालेज के बारे में होती थी । उसे उनमे काफी दिलचस्पी लगती थी। 

पिछले सात महीने में उसने केवल एक बार मुझे वापस लौटाने की कोशिश की थी । उस दिन वो काफी थकी लग रही थी। लेकिन दलाल ने उसे जबरदस्ती तैयार कर लिया । उस दिन पहली बार मुझे लगा की वो जिंदा है..... उस दिन शायद उसे भी पहली बार लगा की मैं इंसान हूँ । हमने कुछ किया नहीं उस रात। केवल बातें की

"तू ये सब पढ़ के कितना कम लेगा रोज़?"
"रोज़ नहीं ...महीने के मिलेंगे....कम से कम 25 30 हज़ार"
"कितने घंटे काम करना होगा"
"10 घंटे ....कभी कभी ज्यादा भी हो सकता है"
"कितने साल तक??"
"जब तक मैं चाहूँ....50 का होने तक तो कर ही सकता हु"
"साला तुम लोग अच्छे रंडी हो......हम लोग का तो 35 के बाद ख़तम."
"मैं इंजिनियर हु....."
"कौन सा रंडी से कम हो.....हम तो केवल शरीर बेचते हैं.....तुम तो दिमाग भी बेंच दोगे...... लेकिन दाम अच्छा मिलता है तुमको।"
मेरे पास उसका जवाब नहीं था.....था भी तो मैं दे नहीं पाया जाने क्यों??
"जानता है मुझे बचपन का कुछ याद नहीं.....माँ बाप भाई बहन कुछ नहीं । बस एक ही बात याद आती है । मुझे दुल्हन बनना बहुत अच्छा लगता था । सज धज के अपने आदमी का इंतज़ार करना । और किस्मत देख आज मैं रोज दुल्हन बनती हूँ..... रोज आदमी का इंतज़ार करती हूँ । फर्क बस इतना है मेरा आदमी बदल जाता है । "
कुछ देर रूककर उसने खुद को आईने में देखा और हसने लगी 
"कितनी खुशकिस्मत हूँ मैं" 
मैंने दो तीन पानी की बूँदें महसूस की थी उसी समय अपने हाथ पर। 
पता नहीं वो उसके आँख के थे या मेरी आँख के या शायद छत टपक रही थी 
उस रात उसने और भी बहुत कुछ कहा था पर मैंने कुछ सुना नहीं....मैं उन दो बूंदों की गुत्थी में ही उलझ के रह गया ।
उस रात के बाद हमारा रिश्ता कुछ बदल गया । ये प्यार नहीं था........दोस्ती या सहानुभूति जैसा भी नहीं था । जाने क्या था वो। बस एक रिश्ता था ।
अब मैं वहां रोज़ जाता था। वो अब भी दुकानदार थी और मैं खरीददार बस हममें अब थोड़ी जान पहचान थी। हम एक दुसरे का नाम अब भी नहीं जानते थे । वो मुझे मेरे पैसे से पहचानती थी और मैं उसे उसके सामान से जानता था। किसी किराने की दूकान की तरह ।

एक रात मैं थोडा देर से पहुंचा तो वो किसी और के साथ थी। लाख झगड़े के बाद भी मुझे अन्दर जाने नहीं दिया उस दलाल ने । मैं वहाँ से लौट आया । मुझे गुस्सा था । पता नहीं किसी बात पर। शायद
रोज जाने के कारण मुझे अब वो मेरी प्रॉपर्टी लगती थी । उसके साथ होने का हक अब बस मुझे था । वो मैदान का वो कोना थी जहाँ केवल मैं खेल सकता था । 
दूसरे दिन मैंने उसे बहुत उल्टा सीधा कहा ।
"तू थोड़ी देर मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थी"
"क्यों"
"क्यों???......तुझे नहीं पता मैं रोज़ आता हूँ यहाँ"
"तो क्या हुआ??? तूने खरीदा नहीं है मुझे....."
"साली रंडी!! खरीदा नहीं है तुझे लेकिन तू मेरी है....सिर्फ मेरी"

उसके बाल अब मेरी मुठ्ठी और होंठ होंठों में थे । एक पुरुष ने फिर शक्ति से अधिपत्य जता दिया था । मैंने रेत मुट्ठी में बाँध ली थी । 

उस रात वो कुछ नाजुक सी लग रही थी.... जैसे कहीं कोई जोड़ खुल गया हो......एक गाँठ जिसके सहारे उसने सब कुछ संभाल रखा था वो टूट रही थी । बिखर रही थी वो । लेकिन उस समय मुझे ये सब नहीं दिखा । मैं अपने पुरुषत्व की जीत की ख़ुशी मन रहा था। 

उस रात के बाद वो मुझे कभी नहीं मिली । कोई नहीं जानता वो कहाँ गयी। क्यूंकि वो रेत थी....मैंने उसे मुट्ठी में बाँधने की गलती कर दी थी.......और वो मेरी मुट्ठी से जाने कब फिसल के गायब हो गयी । रेत ऐसी ही होती है ।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 

रात ढल जाने दो 
चाँद गल जाने दो
हो जाने दो सहर 
सूर्य जल जाने जो

बस कहती रहो
तुम कहती रहो


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 


शब्द खोये हैं मेरे 
कुछ भी करूँ कैसे बयाँ 
तुम जानती हो सब 
कहने को बाकी क्या रहा 


बस तेरे ख्वाब खुद मे 
मैं बुनता रहूँ
तुम कहती रहो
बस मैं सुनता रहूँ

बीत जाये ज़िन्दगी 
तेरी बातों में यूँ ही 
तू है साथ तो मुझे  
मौत का भी डर नहीं 
काट लूँगा हर सफ़र 
संग जो तुम चलती रहो 


मैं सुनता रहूँ
तुम कहती रहो 
रग रग में तुम यूँ ही 
मेरे तुम बहती रहो 


बस कहती रहो 
बस...
कहती ही रहो.......

सोमवार, 21 जनवरी 2013

बदलाव


दिन भी बदला रातें बदलीं 
बदले मौसम चार 
पर विक्रम वही का वही 

कपड़े बदले लत्ते बदले 
बदले साज श्रंगार 
पर विक्रम वही का वही 

शक्लें बदलीं अक्लें बदली 
कोई बदले रूप हजार 
पर विक्रम वही का वही 

रिश्ते बदले नाते बदले
बदले नेक विचार 
पर विक्रम वही का वही 

कुछ बुरे जो बदले अच्छे बदले 
कुछ बदल हुये बेकार
पर विक्रम वही का वही 

बाबा बदले नेता बदले
है दल बदलू सरकार 
पर विक्रम वही का वही 

ये विक्रम ससुरा क्यूँ न बदले 
अब बदल भी जाओ यार 
पर विक्रम वही का वही

रविवार, 20 जनवरी 2013

चिल्लर (तीसरी किश्त)


1
मेरी गुस्ताख़ नज़रों से जो बच पाओ तो बच लो तुम
नज़र का तीर है इसको कोई पर्दा क्या रोकेगा??
…………………………………………
2
 बड़े अनमोल मोती हैं इन्हे यूं ज़ाया न करो
हर किसी की बात पर यूं मुस्कुराया न करो
इन खंजरों से होना क़त्ल बस मेरा ही हक़ है
मुस्कान के खंजर सब पे यूं चलाया न करो
…………………………………………
3
 तेरी गली से गुजरता हूँ तो आँखें मूँद लेता हूँ
डर है कि तुझे देखा तो रस्ता भूल जाऊंगा
…………………………………………
4
 वो मज़ा और वो सुकून अब नींद मे कहाँ ??
जो तेरी याद मे है जाग के आँसू बहाने में ...
…………………………………………
5
 चमकते चाँद से पूछो पिघलती रात से पूछो
कितने आँसू बहे मेरे ये इस बरसात से पूछो
…………………………………………
6
 मुझे जब नींद आई तो भी मैं सोया नहीं
मेरे ख्वाबों भी तुम मुझको छोड़ जाते हो
…………………………………………
7
 फेहरिस्त-ए-आशिकान मे सबसे ऊपर नाम मेरा लिख दो
मैं इक गुमनाम शायर हूँ, नाम बदनाम मेरा लिख दो
…………………………………………
8
 तेरा ही नूर है मुझमे, तुझे बाहर मे क्यूँ ढूँढूँ
जब तेरी याद आती है, मैं आईना देख लेता हूँ
…………………………………………
9
 वो प्यार करेगी तुमसे, उसे प्यार करने की वजह तो दो
ज़रा दिल साफ करो, उसे दिल मे रहने की जगह तो दो
…………………………………………
10
 तेरे आने से मेरी ज़िंदगी यूं गुलशन है कि
दश्त-ए-ग़म मे भी अब चाहत के फूल खिलते हैं....
…………………………………………
11
 दिल चाहा के तुझको बुला लूँ चुपके से मैं ख्वाबो में
ये भी तो हो न सका लेकिन,मुझे नींद न आई रातों में
…………………………………………
12
 कोई नहीं शरीफ यहाँ, बस शरीफ बनते हैं
नकाब लगाकर ही ये घर से निकलते हैं
किसी के आँसू किसी की हंसी का कारण है
दर्द ओ ग़म से भी लोगों के दिल बहलते हैं
…………………………………………
13
 आधी रात अकेले मे जब नींद नहीं आती हमको
सोच के तेरी बातों को तन्हा मुसकाया करते हैं
…………………………………………
14
 इस लफ्ज को हम जानते थे पहले भी मगर
वो अजनबी हमें प्यार का मतलब सिखा गया
…………………………………………
15
 दिल पर नहीं है ज़ोर, इसको रोक लूँ कैसे
फिर चल पड़ा है देखो मोहब्बत की राह पे
…………………………………………
16
 मैं हूँ दर्द का सौदागर, मैं दर्द बेचता हूँ
जब दर्द न हो तो भरे जख्म कुरेदता हूँ
कहने को तो सुख़न में सुख आता है मगर
यहाँ दुख से भरा हर सुख़नवर देखता हूँ...
…………………………………………
17
 उनकी नफ़रतों से दिल जाने क्यूँ प्यार कर बैठा
बेगुनाही को अपनी ये गुनहगार कर बैठा
करने आए थे कुछ और, और कुछ और  कर बैठे
इश्क़ की बेखुदी मे क्या न जाने यार कर बैठा
…………………………………………
18
 कल राह मे अचानक किसी ने नाम पूछा तो
बेखयाली में हम उनका नाम कह गए
आज जब उन्होने कहा मेरी तारीफ करो तो
जाने हम क्यूँ खुदा का कलाम कह गए
…………………………………………
19
 पुकार लेना मुहब्बत से जो दिल चाहे अकेले में
इन नामों की नुमाईश जहाँ में मगर अच्छी नहीं लगती
…………………………………………
20
 किसी के इश्क में पड़कर भी कभी देखिये "विक्रम"
उसकी बदसलूकी भी अदा इक शोख़ लगती है .
…………………………………………
21
 वो समझेंगे कभी तो, बस तू समझाए जा
बुझाने दे चराग उनको, तू फिर जलाए जा
कहाँ जा रहे हैं वो, खुद उनको नहीं पता
वो सुनें न सुनें राह तू उनको बताये जा
…………………………………………
22
 उनसे कह तो दिया कि तन्हा ही जी लेंगे मगर
तन्हाई में जीना हमें आता ही कहाँ है....
…………………………………………
23
क्या कहें तुमसे कि हमें ग़म है क्यूँ
क्या बताएं तुम्हे ये आँखें नम है क्यूँ
जलने कि है आदत मेरी, चुपचाप जलने दो
मत पूंछो कि इस दिल में जलन है क्यूँ
…………………………………………
24
 कभी खुद की न थी फिक्र, मौत से डर न था मुझे
जब से तू मिला है यार, बड़ा संभल के चलता हूँ
…………………………………………
25
अपनी इन अदाओ से मेरा दिल ले लिया तूने
नज़र से मारकर मुस्कान से ज़िंदा किया तूने
…………………………………………
26
हर तरफ है रोशनी, है हर सू उजाला
सचमुच तेरे शहर की रात अलग है
…………………………………………
27
मेरे सनम, तुम भी कमाल करते हो
खुद जवाब हो फिर भी सवाल करते हो
…………………………………………
28
तरीके कत्ल के जहां मे और भी है मगर
तुम्हारे इस तरीके से मरने में मज़ा है
…………………………………………
29
सौ बार कहा दिल से, तू उनको याद न कर
बहरा है तेरा खुदा उस से फरियाद न कर
नादान है मेरा दिल मेरी इक मानता नहीं
तड़पेगा रात-ओ-दिन ये शायद जानता नहीं
…………………………………………
30
तेरी हर खता-ओ-गुनाह को तो मैं माफ कर दूंगा
पर ये बता क्या भूल मेरी तू भूल पाएगा


पिछली दो किश्तें-

1- कुछ चिल्लर

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

विक्रम


जो कोई पूछता है, कैसा तू इंसान है विक्रम
कभी शैतान है विक्रम कभी भगवान है विक्रम

वो कहते है समझ पाना तुझे मुश्किल बड़ा है यार
तू दिल से दिल मिलाकर देख बड़ा आसान है विक्रम

है मौसम सा मिजाज इसका पल भर मे बदलता है
कभी है जान-ए-महफिल तो कभी बेजान है विक्रम

बुरा न मानिए साहिब इसकी गफलतों का कुछ
चला जाएगा, पल दो पल का बस मेहमान है विक्रम

है इससे ताल्लुक क्या आपका न सोचिए साहिब
है सबसे आशना बस खुद से ही अंजान है विक्रम

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

कुछ और चिल्लर.....



१. न ये धरती न वो आसमाँ चाहता हूँ... 
बस मैं तेरा करम मेहरबाँ चाहता हूँ...
तेरे पहलू में मौत की है ख्वाहिश मुझे...
मैं हूँ परवाना, मैं बस शमा चाहता हूँ ...

२. May be u don't feel like i feel
everyone has his choice 
it's not a big deal 
but do one thing
give me back my heart
i have lost this game
before u, i kneel.....

३.वो लड़की रोज़ मेरे ख़्वाबों में आ जाती है, 
सोये अरमानों को वो हर रात जगा जाती है,
उस से तन्हाई का शिकवा भी तो कर सकता नहीं 
रोज़ मिलने का वडा भी वो निभा जाती है| 
वो लड़की रोज़ मेरे ख़्वाबों में आ जाती है....

४. बड़े शौक़ से वो फिर हमें आजमाने आये,
इस बार इज़हार-ए-मोहब्बत बहाने आये 
उनका इश्क दिल्लगी से ज्यादा कुछ नहीं,
और वो मेरे इबादत से इश्क का मजाक बनाने आये |

५.अपनी बस एक गलती की सजा इतनी मिली है 
मौत से  बदतर तन्हाई की ज़िन्दगी मिली है  
अपनी धडकनें भी तो अब बेगानी लगती है 
आह की शक्ल में हमें सांस आखिरी मिली है |

६. कल नशे में मैंने यारो जाने क्या क्या कह दिया
अपने दिल को अपने ज़िस्म से जुदा कह दिया 
इश्क की मदहोशी का आलम तो देखिये
मुझ काफिर ने उन्हें इकलख्त अपना ख़ुदा कह दिया

७. मेरे दिल को कई ख्वाब वो दिखाने लगी है
मेरे ज़ेहन में अपना घर वो बनाने लगी है
वो जानती है कि अदाएं उसकी कातिल हैं मगर
फिर भी अदाएं वो हम पर आजमाने लगी है.....

८. सूनी तन्हा रातों में अकेला जागता हूँ...
जाने क्यों खुद से ही इतना भागता हूँ ....
जब सो जाती है सारी दुनिया सुकून के साथ...
तब खुद से खुद के गुनाहों की सज़ा मांगता हूँ | 

९. अपने एहसासों को भी लफ्ज़ दे देते थे 
अपने जज्बातों को शेरों में बदल देते थे 
उनसे कहने की हिम्मत कभी होती न थी 
तो वो शेर facebook पे छाप देते थे 
आज जाना, जब उनकी profile खोली 
वही शेर वो boyfriend को  forward कर देते थे ......:'

१०. फिर से कोई हमें तन्हाई का मतलब सिखा दे, कह दो ...
मेरे ख्वाबो को  को मेरी नींदों से मिटा दे, कह दो ....
नहीं जलना है मुहब्बत की आग में मुझको,
के मेरे अरमानों की आग कोई बुझा दे, कह दो.... 

११. There was a time when u were my best friend
and you were with me for my whole life...
and then here i am......in love with you.....
& losing you when you became my life

१२. कभी कभी ख़ुद को समझना भी कितना मुश्किल हो जाता है ....
तुम किसी और के हो ये जानकर के भी 
पगला है दिल, जो तुमको चाहता है...
तुमसे बात करने से तुम और अपने लगते हो 
तुमसे बात करने से सो दिल और घबराता है 
न करे गर बात हम तुमसे तब भी तो चैन नहीं आता 
जो न देखें कभी तुमको तो दिल आंसू बहाता  है .....
कभी कभी ख़ुद को समझना भी कितना मुश्किल हो जाता है ....

१३. ज़िन्दगी है नादान इसीलिए चुप हूँ,
दर्द ही दर्द सुबह शाम इसीलिए चुप हूँ,
कह दू ज़माने से दास्ताँ अपनी,
उसमे आएगा तेरा नाम इसीलिए चुप हूँ 

१४. हम उनकी ख़ामोशी से भी उनके दिल की हर बात ही पढ़ लेते है,
और वो मेरी हर बात से कहानियाँ कुछ और ही गढ़ लेते है

१५. छोड़ा न था दोस्तों ने साथ मेरा तब तलक 
जब तलक तार उनके दिल का किसी ने छेड़ा न था 

१६. तुम्हारी याद में तड़पते हम आज भी हैं 
मिलने की ख़ुशी जुदाई का ग़म आज भी है 
अब तो आता है तरस खुद पर, और इश्क पर अपने 
फिर भी जाने क्यूँ इश्क पर दिल को नाज़ आज भी है  

(बाकी फिर कभी)

बुधवार, 13 जुलाई 2011

कुछ चिल्लर(१)....

१.जब जब आईने में क़ैद वो इंसान देखा |
   तब तब खुद में छुपा हुआ इक शैतान देखा |
सारी दुनिया को दिखाता था गुलिस्तान-ए-नेकी जिसमें |
उसी दिल में दफन बदी का बियाबान देखा |


२.अपनी ही उलझनों में खोया सा हूँ मैं |
जागते हुए भी लगता है कि सोया सा हूँ मैं |
आँखें भी तो मेरी नम हुयी नहीं मगर |
लगता है जाने क्यूँ के रोया सा हूँ मैं |


३.उनकी जुदाई में तड़पते हैं इस क़दर |
खुद की नहीं खबर, करार है भी या नहीं |
तन्हाईयों ने हमें सताया कुछ कम न था |
उस पर ये कशमकश के उन्हें प्यार है भी या नहीं |


४.वो सिखाते हैं हमें आज ज़िन्दगी का सबक |
नहीं जानते के हमने हर तारीख देखी है |
देखा है सफेदपोशों के चेहरे पे नकाब |
गोरे चेहरों के पीछे लगी कालीख देखी है |
उनसे कह दो न रहे किसी गफ़लत में वो |
हमने हर सच के गले झूठ की तावीज़ देखी है |


५. ज़िन्दगी न और अब तू मेरा इम्तिहान ले |
जल जल के थक गया हूँ कसौटी की आग में |

६.ज़िन्दगी बता कैसे मैं तेरा ऐतबार कर लूँ 
तू भी तो साथ मौत को छुपा कर के लायी है |


७.सीने में एक आग सी लगी है जो 'विक्रम' |
इश्क के शोलों से हैं वो, उसको बुझा रहे  |


८.हारने का नहीं, है मुझे बस जीतने का दर |
हर जीत पर है मेरे दुश्मनों की तादाद बढ़ गयी |


९.मेरे शायरी के शौक ने मुझे देखो ला दिया है कहाँ |
अपने ग़मो पे भी अब तालियों की उम्मीद रखता हूँ |



१०.क्यूँ रहूँ बदनाम मैं बेवजह, बेक़सूर |
मेरी बदनामियों को इक वजह तो दे दो |
नींदें उजड़ी मेरी ख्वाब बेघर हुए |
अपनी नींदों में इन्हें थोड़ी जगह तो दे दो |



११.लम्बा है सफ़र इसमें कोई आसरा तो हो |
नजदीकिय न हो न सही, फासला तो हो |
तेरी गली में आके कभी, हो जायें हम बदनाम |
चाहत का नहीं नफरत सही, कोई माज़रा तो हो |


१२.आशियाना मेरा जलाकर देखो वो,
 हैं रकीबों घर रौशन कर रहे |
मेरी खताओं की सजा मुझे देने के लिए
मुझ पर नहीं, हैं वो खुद पर सितम कर रहे |


१३.चाँद घटता रहा, रातें बढती रही 
मैं तड़पता रहा, तू तड़पती रही 
बात थी एक ही दोनों के दिल में मगर 
मैं वो कह न सका, तू छुपाती रही 


१४.जाते हुए तुमने हमें मुड़कर नहीं देखा |
अरे ऐसा भी क्या गुस्सा कि इक नज़र नहीं देखा |
नहीं देखे हैं हमने फूल कभी नाज़ुक तेरे जैसे |
मगर हाँ सच है कि तुमसा कभी पत्थर नहीं देखा |


१५.you are 'R' of my heart 
without you my heart is incomplete 
with you it keeps me alive 
without you i am left with just 'heat'.



(कुछ छुट्टे और भी हैं, वो फिर कभी.....)

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