शनिवार, 30 अप्रैल 2011

इंसान हूँ मैं !!

अपनी ही महफ़िल में खड़ा मेहमान सा हूँ मैं,
अपने इन हबीबों से भी तो हुआ अनजान सा हूँ मैं,
अरे लोगों न करो गलती मुझे जिंदा समझने की,
इस सीने के भीतर ज़रा बेजान सा हूँ मैं |

मेरे फ़न ने दीं जब से मुझे बदनामियाँ मेरी,
तन्हाँ कर गयी तब से मुझे तन्हाईयाँ मेरी.
हाँ हूँ शायर मैं लेकिन ज़रा ये भी तो सुन लो सब,
उनके शहर की गलियों में ज़रा बदनाम सा हूँ मैं |

मेरे इश्क ने मुझको दीवाना कर दिया ऐसा,
न रहा इस जहाँ में कोई पागल मेरे जैसा |
ए लोगों चलो माना ये भी के  वहशी हूँ मैं लेकिन,
ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं |


ज़रा बाक़ी है मुझमे इंसानियत ज़रा इंसान सा हूँ मैं | 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

Sorry


I am sorry, coz I am not that,
O My Dear! what you want me to be.
& I am sorry, coz I don't have,
all the things that u want in me.

I am sorry, coz sometimes
I can't understand you.
& also for neglecting
the things that u want me to see.

I can change myself for you,
this is sure,
& more than anything i want thee.

But getting you will be of no worth,
O My Love! if I am not me.....

शनिवार, 5 मार्च 2011

"अल्लाह मालिक"

इक दिन कहा था तुमने ही 
कि ये मुल्क चमन होगा |
और ये भी कहा था तुमने शायद 
इसमें सुकून-ओ-अमन होगा |
अभी ऐसा कुछ तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

इक दिन कहा था तुमने ही 
की माँऐं रातो को न रोयेंगी |
और वादा किया था कि औलादें अब 
कभी खाली पेट न सोयेंगी |
अभी ऐसा भी तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

इक दिन कहा था तुमने ये भी कि 
अब नहीं मरेगा कोई नत्था 
और भरोसा दिलाया था हमको
के दागी न पायेंगे सत्ता 
अभी ऐसा भी तो हुआ नहीं 
आगे क्या हो "अल्लाह मालिक" 

उस दिन कहा था मैंने भी
 कि ये दिन इक दिन तो बदलेंगे
तुमको उखाड़ फेकने को
लोग सडकों पर निकलेंगे
 अब ऐसा जब हो रहा है तो
तेरा क्या हो "अल्लाह मालिक"

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

पंख

खुले गगन में, वन उपवन में
अब जाने को दिल करता है
बंधन तोड़ के, सब कुछ छोड़ के
उड़ जाने को दिल करता है |
दिल करता है संग हवा के 
 दूर कहीं मैं बह जाऊं 
दिल करता है फिर न लौटूं 
वहीँ कहीं मैं रह जाऊं 
कटी पतंग सा दिल की उमंग सा  
हवा में गोते मैं खाऊँ
फिर न आऊँ कभी ज़मीन पर
रहूँ हवा में इतराऊँ
पर इक इक करके इतने दिन से
चुन चुन के जो जोड़े हैं
अब याद नहीं आता है
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं

याद नहीं आता है 
क़ि वो पंख कहाँ रख छोड़े हैं


रविवार, 6 फ़रवरी 2011

For a facebook friend

जब तू मेरे साथ (online) होती है
जाने क्या बात होती है 
दिल होता है मेरे सीने में 
पर धड़कन तेरे पास होती है 
नहीं देखा है तुम्हे मैंने 
मगर अपनी सी लगाती हो 
शक्ल और आवाज से ही नहीं 
दिल से भी पहचान होती है 
मैं वहशी हूँ मै पागल हूँ
मैं जानता हूँ ये सब 
मगर मैं इंसान होता हूँ 
जब तू मेरे साथ होती है |
जब तू मेरे साथ होती है |


(यह रचना एक फेसबुक मित्र  के आग्रह पर उनके के लिए लिखी थी )

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

उम्मीद

हर रोज़ सवेरे उठता हूँ,
खिड़की से बाहर तकता हूँ,
सोचता हूँ -
पौधों में कली लगी होगी,
अपनी बगिया भी सजी होगी,
हर तरफ फिजा छाई होगी |
और शायद तू आई होगी |
पर ये हवा बहार नहीं लाती है,
हर रोज़, तू नहीं आती है |

हर शाम मैं छत पर चढ़ता हूँ,
और लाख उम्मीदें गढ़ता हूँ |
सोचता हूँ -
ये आकाश आज गुलाबी होगा,
मौसम भी आज शराबी होगा |
हर ओर मदहोशी छाई होगी,
और शायद तू आई होगी |
पर उम्मीदें धोखा खाती हैं |
हर शाम तू नहीं आती है |

कल रात पवन कुछ यूँ मंद चली,
चहक उठी मेरी सूनी सी गली |
मौसम भी शराबी होने लगा,
ओर बीज फिजा के बोने लगा |
मेरे संग एक परछाई थी,
कल सपने में तू आई थी |

कल सपने में तू आई थी |

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

इतने समय तक अनुपस्थित रहने के लिए, आप सभी से क्षमा चाहता हूँ | दरअसल एक मित्र (?) ने हमारा अकाउंट हैक कर लिया था| किसी प्रकार पुनः प्राप्त कर पाया हूँ सो फिर उपस्थित हूँ | यदि इन दिनों किसी ब्लॉगर मित्र को मेरे नाम से कोई अभद्र टिप्पणी या मेल प्राप्त हुआ हो तो क्षमा चाहूँगा |
जल्द ही अगली रचना पोस्ट करूँगा | आशा है आपका प्यार मिलेगा |
धन्यवाद |

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

मैं जिंदा हूँ ?



आज ज़िन्दा हूँ मैं फिर एक जमाने के बाद,

आये फिर याद मुझे वो, भूल जाने के बाद |
देके पल दो पल की ख़ुशी फिर वो लौट जायेंगे,
जो आज आये हैं सारी उम्र सताने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ......

करवटों में कटी रात, आँखों में थी नींद कहाँ
शमा बुझाई भी तो, सारी रात जलाने के बाद |
रात के संग हम भी जले इस क़दर,
राख़ भी ना मिली, हमको बुझाने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ........

रूठने का हुनर हमको भी आता है मगर,
खुद तड़पते हैं हम रूठ जाने के बाद |
उनके तेवर भी बदलते हैं मौसम की तरह,
खुद ही रूठ जायेंगे, वो हमको मनाने के बाद |
आज ज़िन्दा हूँ........

तन्हाई के दोज़ख में फिर वो मुझे छोड़ गए,
जन्नत-ए-इश्क के ख़्वाब दिखाने के बाद |
फिर ना आई मौत मुझे मर कर के भी,
आज जिंदा हूँ मै फिर मर जाने के बाद |

आज जिंदा हूँ मै फिर मर जाने के बाद |

(यह पोस्ट गलती से मिट गयी थी अतः पुनः पोस्ट कर रहा हूँ |)

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

बेक़दर

वो क्या समझेंगे मेरी जुदाई की तड़प
जिनका अपना कभी उनसे जुदा ना हुआ |
माना उनको मैंने रब, उनका सजदा किया,
पर मैं कभी उनके दिल का खुदा ना हुआ |
पूंछते हैं वो " चाहोगे कब तक हमें?"
शायद क़र्ज़ दिल का जब तक अदा ना हुआ |
वो क्या समझेंगे........

हम तड़पते रहे इश्क में रात दिन,
पर उन्हें तरस हम पर ज़रा ना हुआ |
प्यास से मर गए बीच नदिया के हम,
आब का एक कतरा पर मेरा ना हुआ |
नहीं गुजरा कभी एक पल एक दिन,
ज़ख्म दिल का मेरे जब हरा ना हुआ |
वो क्या समझेंगे........

वो क्या समझेंगे मेरी जुदाई की तड़प 
जिनका अपना कभी उनसे जुदा ना हुआ |

रविवार, 28 नवंबर 2010

सजा

मेरे दिल में शमा-ए-इश्क जला कर के चल दिए |
मेरे इश्क को गलत वो बता कर के चल दिए |
पहली नज़र में ही था हमें घायल कर दिया,
क्या फायदा कि अब जो नज़र झुका कर के चल दिए |
मेरे दिल में........

उन्हें हमसे नहीं है इश्क, है ये उनके दिल कि बात |
किसी और के है वो, समझते हैं हम उनके जज़्बात |
पर उम्मीद के सहारे हमें जीने का हक तो है |
क्या हक था उन्हें, जो उम्मीदों का महल गिरा कर के चल दिए |
मेरे दिल में........

मुझको अगर है इश्क तो, मेरी ख़ता है क्या ?
परवाने की मौत की कहो तुम ही वज़ह है क्या ?
शमा ने जलाया है उसे मानोगे ये तुम भी,
अपने गुनाह की हमको सजा सुना कर के चल दिए |
मेरे दिल में........

मेरे दिल में शमा-ए-इश्क जला कर के चल दिए |

शनिवार, 27 नवंबर 2010

वो पागल है ?

क्या वो पागल है, जो बेवजह मुस्कुराता है ?
पागल ही है, तभी सरे राह गुनगुनाता है |
अपनी ही धुन में वो गली गली घूमता है |
राह चलते जानवरों को तो कोई पागल ही चूमता है |
वो राहगीर है, उसका कोई घर बार बही है |
उसे किसी का, किसी को उसका इंतजार नहीं है |
बिना खाए पिए भी दिन रात मुस्कुराता है |
ऐसे ही इंसान को तो पागल कहा जाता है |
क्या वो पागल है........

हर तरफ आग है, है हर ओर बस नफरत का धुंआ,
एक दूजे कि जाँ ले रहे हैं हिन्दू मुसलमाँ |
पर उसे फर्क नहीं, वो तो मुस्कुराता है |
जलते चौराहों पर वो नाचता और गाता है |
खिड़की से देख उसे, मैं घबराता हूँ |
दरवाजा खोल, दौड़ उसके पास जाता हूँ |

पूँछता हूँ की क्यों खुश है ? कैसा इंसान है तू ?
ये बता हिन्दू है या कि मुसलमान है तू ?
ये सुनकर के वो और मुस्कुराता है ,
जवाब देकर वो हँसता और आगे बढ़ जाता है |
कहता है- "ना मै हिन्दू हूँ, ना हूँ मुसलमान मै |
 इन वहशियों कि बस्ती में हूँ इकलौता इंसान मैं |
  ये सब हो गए हैं देखो ना बिलकुल पागल |"
इतना कहकर के बढ़ गया आगे वो पागल |
उसको सुन कर के मैं सोच में पड़ जाता हूँ ,
"कौन पागल है ?" खुद से पूँछता लौट आता हूँ....

"कौन पागल है ?".......

बुधवार, 24 नवंबर 2010

दरिया

मैं खुद दरिया हूँ, तुमसे मिलने मैं पार आऊँ कैसे ?
तुम्हें मैं अपने दिल का हाल सुनाऊँ कैसे ?
कई घरों मे लगी आग है बुझाई मैंने,
पर जो खुद मुझमे लगी है वो बुझाऊँ कैसे ?
मैं खुद........

मेरी लहरें तेरे साहिल को डुबो देती हैं,
तुमको छूने को मैं हाथ बढाऊँ कैसे ?
लोग सुन लेंगे तो कर देंगे वो बदनाम तुम्हें,
डर है रुसवाई का तो कहो तुमको मैं बुलाऊँ कैसे ?
मैं खुद........

कल तपूँगा धूप में फिर हवा में घुल जाऊंगा,
मिलूंगा गर्द से तो बादल में बदल जाऊंगा |
संग हवाओं के मैं तेरी गली आऊँगा,
तेरे बदन पे मै कुछ यूँ बरस जाऊँगा |
तुझे भिगोऊंगा खुद तुझमें डूब जाऊँगा |
बनके फुहार तेरी जुल्फों से उलझ जाऊँगा |
बूँद बन करके तेरे गालों से ढलक जाऊँगा |
चूम कर होंठ, तेरी गर्दन से उतर जाऊँगा |
है ये वादा के मिलूंगा मैं कल ही तुमसे,
पर ये जो रात घनी है वो बिताऊँ कैसे ?
मैं खुद........

मैं खुद दरिया हूँ, तुमसे मिलने मैं पार आऊँ कैसे ?

सोमवार, 22 नवंबर 2010

सपने

ज़िन्दगी का ताना बाना बुनता है मिटाता है मन,
खुद के रचे इस इन्द्रजाल में खुद ही उलझ सा जाता है मन |
अपने जिन ख्वाबों का सिर पर ताज पहन कर तनता था ये,
आज उन्ही सपनों का बोझा क्यूँ कर ना सह पता है मन |
ज़िन्दगी का ताना बाना.....


कुछ सपनो की चादर ओढ़े, कहीं दुबक कर बैठा था बचपन |
अपने जिन सहज सरल सपनों को , उँगलियों पर गिनता था बचपन |
अपने सपनों की राहों पर रोज़ घूमने जाता था ये ,
आज उन्ही राहों पर बढ़ने, से क्यों है कतराता ये मन |
ज़िन्दगी का ताना बाना.....

 ज़िन्दगी का ताना बाना बुनता है मिटाता है मन |

शनिवार, 20 नवंबर 2010

दीवाना

दूर जा के भी दूर मुझसे तुम जा ना सकोगे |
भूल जाओगे खुद को, पर मुझे भुला ना सकोगे |
तुम में ही मै दफन हूँ, हूँ तुम में ही रवाँ |
मेरे निशान अपने जिस्म से, मिटा ना सकोगे |
दूर जा के ......


तुम तो हो ही ख़ास, पर मैं भी कोई आम नहीं हूँ |
सुन कर के भुला दोगे,  मैं वो नाम नहीं हूँ |
आशिक मिलेंगे मुझसे तुम्हें, दुनिया में रोज़ लाख |
दीवाना कोई मुझ सा कहीं पा ना सकोगे |
दूर जा के भी दूर मुझसे तुम जा ना सकोगे |

 दूर जा के भी दूर मुझसे तुम जा ना सकोगे |

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

तलाश

फिरता है क्यूँ गली में, क्यूँ भटकता है दर-ब-दर |
हर सू यही सवाल है, यही पूंछे है हर नज़र |
मेरा यही जवाब है, यही बात बोलता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

कल थी जो साथ, पर छिन गयी उनकी गली में |
अपने लबों की खोयी वो मुस्कान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

उनकी उठे मुझ पर भी इनायत की इक नज़र |
उनकी हसीं आँखों का वो एहसान ढूंढता हूँ |
मेरा कुछ......

 उड़ा ले जाए मेरी गमीं को जो दूर बहुत दूर |
मै उनकी चाहतों के वो तूफ़ान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

 है दूर मगर फिर भी मेरे दिल से जुदा नहीं,
 मेरे दिल के कमरे का वो मेहमान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

सामने बिठा के मैं कर सकूँ उनका भी सजदा,
सालों से मै बस वो इक रमजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ......

खुद से हूँ बेखबर, नहीं दुनिया का कुछ पता,
 अपने हश्र और हाल से अनजान ढूँढता हूँ |
मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

मेरा कुछ खो गया है, मै वो सामान ढूंढता हूँ |

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

रिश्ते


दिल करता है अब हम रो दें,
बाँध तोड़ दें, जंहाँ डुबो दें |
चीख चीख कर सबसे कह दें,
बस बहुत हुआ, अब और नहीं |
रिश्ते इंसानों के और नहीं |

ये वो इंसान हैं, जो लड़ते हैं,
जाति धरम पर, क्रिया करम पर,
सच्चे झूठे मिथक भरम पर |
कब, क्यूँ, किससे लड़ ले ठौर नहीं |
बस बहुत हुआ, अब और नहीं |
रिश्ते इंसानों के और नहीं |

 ये वो इंसान हैं, जो लड़ते हैं,
कभी मज़हब पर, कभी सरहद पर,
तो कभी दूसरे की बरक़त पर |
इनके रिश्तों को अब खो दें |
दिल करता है अब हम रो दें |

दिल करता है अब हम रो दें |

सोमवार, 15 नवंबर 2010

जीवन





आज हुआ क्या ऐसा मानव,
जो आँखों में आंसू   है |
आज हुआ क्या ऐसा मानव,
जो रोने का दिल करता है | 
टूट गया क्या कोई सपना,
या बिछड़ा है कोई अपना |
माना  क़ि दुःख होता है ,
जब कुछ ऐसा होता है |
सपने तो बनते और बिखरते है ,
जीवन में अपने मिलते और बिछड़ते   है,
विरले होते है जो फिर भी बैठे हँसते है | 
छोड़ ये सारी व्यर्थ क़ि चिंता ,
बस तू आगे बढ़ते जाना |
बिना  रुके रस्तों में तू ,
मंजिल पर तू बढ़ते जाना |
सपने तो उनके पूरे होते है ,
जो टूटे सपने फिर से बैठ संजोते है |
कुछ फिर अपने मिल जाते है ,
जब हम आगे बढ़ते जाते है |
मेरा तू बस मान ये कहना,
आगे तू बस बढ़ते जाना,
व्यथित ह्रदय को भरते जाना |
फिर  एक दिन ऐसा आएगा,
जब दुःख तेरा छट जायेगा |
तब कुछ ऐसा  होगा मानव,
आँखों में रश्मि चमकेगी |
तब कुछ ऐसा होगा मानव ,
जीवन में खुसिया छलकेगी |
                                        
[इस चिट्ठे  पर यह मेरी प्रथम रचना  है| अपने विचार जरूर व्यक्त करे.बुरा सही जो भी हो जैसा भी हो अवश्य कहे |विचारों की प्रतीक्षा में आपका अनुज ......................................
                                                                ---विशाल श्रीवास्तव ]

शनिवार, 13 नवंबर 2010

ख़ता

दिल नहीं मानता कि हैं वो बेवफा हो गए
कोई ख़ता हुई है जिससे हैं वो ख़फ़ा हो गए
दिल नहीं मानता कि........

जो थे जीने का मकसद, मेरे मुस्कुराने कि वजह
आज वो दर्द-ओ-ग़म कि वजह हो गए
मेरे दर्द को सुन कर रो पड़ते थे जो
मेरी मौत से भी वो बेपरवाह हो गए
फिर भी दिल नहीं मानता कि हैं वो बेवफा हो गए
कोई खता हुई है जिससे हैं वो ख़फ़ा हो गए...

पहले कहते थे कि मेरे होने से आती है चमन में बहार
फिर क्यूँ  हम आज हवा-ए-खिज़ा हो गए
कुछ भी तो नहीं बदला इस जहां में मगर
हम तुम बदल के क्या से क्या हो गए
कोई बता दे मुझे मेरी मौत से पहले
क्या खता हुई हमसे, क्यूँ वो ख़फ़ा हो गए
दिल नहीं मानता कि हैं वो बेवफा हो गए
कोई खता हुई है जिससे हैं वो ख़फ़ा हो गए
दिल नहीं मानता कि........

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

सफ़र

मुझे बिठा परों पर, ऐ हवा ले चल |
कहीं दूर इस जहाँ से उड़ा ले चल |
ना जान मंजिलें, ना पूँछ तू पता |
करके मुझे मुझसे ही लापता ले चल |
मुझे बिठा परों पर......

ना महफ़िलें वहाँ हों, ना तन्हाईयाँ वहाँ |
खुशियों को यहीं छोड़ दें, ना गम ले चलें वहाँ |
ज़िन्दगी से दूर मौत से कुछ जुदा ले चल |
मुझे बिठा परों पर......

मुझे बिठा परों पर, ऐ हवा ले चल |

बुधवार, 10 नवंबर 2010

नाम

लिख कर इक नाम दिल पर, कभी मिटा न सके |
तुमसे कहने की हिम्मत भी तो, जुटा न सके |
लम्हे तन्हाईयों के, हमने भी गुजारे लाखों,
फिर भी इक पल क्यूँ तेरे साथ, हम बिता न सके |
लिख कर इक नाम.......

यूँ तो धड़कन ने भी बढ़ कर के, पुकारा तुमको |
लब थे ख़ामोश मगर इन ने भी, था चाहा तुमको |
मेरे अरमाँ भी तो बिछे थे, राहों में तेरी |
क्या थी मजबूरी, कि तुम जो कभी आ न सके |
लिख कर इक नाम......

छोड़ देंगे ये गली, गाँव, शहर, और दुनिया,
तुम नहीं मेरे तो, मेरा है भला कौन यहाँ |
तुम थे हर दम मेरे, मेरे और बस मेरे |
क्या थी हम में कमीं, हमको जो तुम अपना न सके |
लिख कर इक नाम......

लिख कर इक नाम दिल पर, कभी मिटा न सके |

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