गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

ख़त



जनवरी की सर्द रात, एक कम्बल 
और कुछ अटपटे ख़याल
थोड़ी सी मदहोशी, कुछ चाय के प्याले 
और मन मे उठे सवाल 
कुछ पुरानी यादें, और वो नज़्में 
जो तुमने गुनगुनायी थीं 
तुम्हारी बातें, और मेरी पुरानी गजलें 
जो मैंने तुम्हें सुनाई थीं 
मेरी गुस्ताख़ शरारत पे 
तुम्हारी हया भरी डांट
हमने बूढ़े पीपल पे लगाई थी 
जो लाल डोरी की गांठ 
कुछ खत जो कभी भेजे नहीं 
और वो बातें जो कही नहीं 
जिस्मों के ये फासले और
दिलों मे दूरिया जो रही नहीं 
वो बेचैनी मे बदली गयी करवटें 
और तनहाई मे भरी गयी आह 
वो पूनम के चाँद को देखकर 
तुमको छू लेने की चाह 
वो किताबों से निकले 
सूखे फूलों की महक 
तेरे चेहरे का ताब, 
तेरी साँसों की दहक
मेरे कुछ रंगीन ख्वाब, 
और आँखें तेरी शराब  


और भी बहुत कुछ मिला कर 
पकाया है जज़्बातों की आंच पर 
फिर कुछ देर ठंडा किया है 
रख के हसरतों के काँच पर।

कागज़ पे परोस कर 
इक ख़त तुम्हें भेजा है
ज़रा चख के ये बताना 
क्या नमक इश्क़ का सही पड़ा है??

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

प्यार





मैं तो कलाम-ए-इश्क़ का व्यापार करता हूँ
खुद भी बीमार हूँ, सबको बीमार करता हूँ 

मुझको दे जाता है वो शख्स हमेशा ही धोखा 
फिर भी भरोसा मैं उसका बार-बार करता हूँ 

देगी तू मौत मुझे इक तो दिन थक करके  
ज़िंदगी इतना तो तुझपे एतबार करता हूँ 

मेरा जनाज़ा न उठाओ उनको ज़रा आने दो 
दो घड़ी और रुक के उनका इंतज़ार  करता हूँ 

वो पूछते हैं, "प्यार करते हो कितना हमसे "
कम ही होगा जो कहूँ बेशुमार करता हूँ 

कैसे मैं छोड़ दूँ घर बार सब तेरी खातिर 
तुझसे ही नहीं माँ से भी प्यार करता हूँ  

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

स्वप्न सुंदरी



हे प्रभु ! मेरी स्वप्न  सुंदरी 
अब तो यथार्थ बन आ जाये 
उसको पाकर जीवन मे मेरा 
मन हर्षित, पुलकित हो जाए 

स्वेत वर्ण और केश स्वर्ण हो,
जो देखे चकरा जाये |
सुंदर, कोमल, मधुर, कर्णप्रिय
बोले तो मन भा जाये |

चले चाल सावन मयूर सी,
बल खा के इतरा जाये |
नयन मृगी से चक्षु हो दोनो,
मदिरा सा रस छलकाए  |
खिले फूल, फुलवारी आँगन, 
हल्का सा जो मुस्काए |

केश ढापते मुख को, जैसे
मेघ चन्द्र पे छा जाये |
फिर संवार उनको शर्माती,
जैसे कोई कली चटक जाये |

कर श्रृंगार जैसे वो निकले,
लगे कोई दुल्हन आये |
हृदय की वाणी चक्षु बोलते,
शीतलता चन्दन छाए |

अंग अंग में रंग भरा हो,
इन्द्रधनुष भी पछताए |
माथे पर यू गोल बिन्दु सा,
सूरज दूर नजर आये |

कर लिहाज यूं चले वो , जैसे 
दंबे पाँव निंदिया आये |
ऐसा रूप हो सुंदर उसका 
कोई न उस सम हो पाये |


हे प्रभु ! मेरी स्वप्न सुंदरी, 
अब तो यथार्थ बन आ जाये | 

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

सावन आवा झूमि के


"घुमड़ घुमड़ के बदरा गावै
सावन आवा झूमि के
रिमझिम-2 परै फ़ुहरिया
तुमहू नाचौ घूमि के"

तुमहू नाचौ, हमहू नाची
नाचै वन बीच मोरवा
बिजुरी कड़कै, जियरा धड़कै
जेकरे मन मा चोरवा 

कबहुँ ताकना, कबहुँ झांकना 
जुगल प्रेम कै जोड़वा
कबहूँ नाद हो सभई साथ हो 
हर-हर भोले थनवा

चलै झूमि के हवा गगन मा
गावत सरसर धुनवा 
नदी लेति अंगड़ाई अइसन 
मगन न कई दे धनवा
तबहूँ मस्त हैं, पिये पस्त हैं 
दूध के साथे  भंगवा 
बरखा के संग गावें बम-बम 
हरियाली कै गनवा

कइसन-
"घुमड़ घुमड़ के बदरा गावै
सावन आवा झूमि के
रिमझिम-2 परै फ़ुहरिया
तुमहू नाचौ घूमि के"

संताप



इतना संताप सताता है, 
अब सुख  भी सहा न जाता है |
है हृदय भरा चीत्कारों से, 
अब नहीं सुनाया जाता है |

रुँध गया कंठ, हे नीलकंठ !
करुणा का अश्रु न भाता है |
अब करो अंत इस जीवन का,
कोई राह नहीं दिखलाता है |

इतना संताप सताता है,
अब नही सुनाया जाता है |

हे प्राणनाथ ! निष्प्राण हूँ मैं, 
अब कुछ भी नहीं लुभाता है |
इस शोक समाहित दुनिया में,
अब और रहा न जाता है |

इतना संताप सताता है,
अब नही सुनाया जाता है |

कुछ करो नाथ, इस तुच्छ साथ, 
अब साथ नही कोई आता है |
इक आस है तेरी दया सिंधु,
मुख गीत तेरा ही गाता है |

इतना संताप सताता है, 
अब नही सुनाया जाता है |

अब क्षमा  करो इस पापी को,
यह शरण में तेरी आता है |
है ज्ञान हुआ इस शापित को,
तू दौड़ के क्यूँ न उठाता है |

इतना संताप सताता है, 
अब सुख  भी सहा न जाता है |
है हृदय भरा चीत्कारों से, 
अब नहीं सुनाया जाता है |

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

प्रेम की सीख




बस प्रेम सिखाने आई थी ??
जो प्रेम सिखाकर जाती हो ??
ख्वाबों में आकर नींद के थैले से 
यूँ चैन चुराकर जाती हो...

तुमने ही सिखाया था मुझको 
सूनी तन्हा रातो मे जगना...
चंदा में देखना प्रियतम को
उँगलियो पर तारों को गिनना...
इक पाठ पढ़ाया था तुमने 
पीरतम हृदय मे बसता है
पर तोड़ नियम अपना खुद तुम 
नस नस मे उतरती जाती हो


बस प्रेम सिखाने आई थी ??
जो प्रेम सिखाकर जाती हो ??
ख्वाबों में आकर नींद के थैले से 
यूँ चैन चुराकर जाती हो...


करो याद चाँदनी रात वो तुम 
जब हम तुम तन्हा थे छत पर
मापा था प्रेम को जब हमने 
अंबर के तारों को गिनकर 
घंटों मौन, इक दूजे को जब 
हमने देखा था आँखों आँखों मे 
उस दिन सीखा था कैसे सुनते हैं
आँखों की बातें आँखों से 
पर आज कहो मैं कैसे सुनूँ 
जब आँख छुपाकर जाती हो ??

बस प्रेम सिखाने आई थी ??
जो प्रेम सिखाकर जाती हो ??
ख्वाबों में आकर नींद के थैले से 
यूँ चैन चुराकर जाती हो...


बुधवार, 14 सितंबर 2011

हमसफ़र



 बस दो कदम और साथ आओ तो सही 
साथ चलने का वादा निभाओ तो सही 

तुम ही कहते थे चलोगे साथ मेरे सदा 
और कहते थे "कभी आजमाओ तो सही"

इतना बड़ा सफ़र देखो बातों में कट गया
चुप न रहो, गीत कोई सुनाओ तो सही 

रूठ कर मुँह न फेरो ऐ मेरे हमसफ़र 
हुई है क्या खता ये बताओ तो सही 

था ये मुश्किल सफ़र, राह थी बड़ी कठिन 
सामने है अब मंज़िल, मुस्कुराओ तो सही 

हो जायेगा "विक्रम" आसान हर सफ़र 
कोई हाथ हाथों में लेकर कदम बढाओ तो सही 

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अच्छा है...


यूँ समंदर में अकेले डूब जाना अच्छा है
यूँ आसमा में दूर तन्हा उड़ जाना अच्छा है
कोई छोड़ दे रस्ते में साथ अपना तो
ज़िन्दगी ये तन्हा  और तन्हा जी जाना अच्छा है...


यूँ  शिशिर की रात  में ठिठुर जाना अच्छा है
यूँ पवन के झोकों में बह जाना अच्छा है
कोई ग़म दे दस्तक अगर दिल पे बार- बार 
तो ऐसी याद से दूर और दूर हो जाना अच्छा है

उनके ख़्वाबों में खुद से अन्जान हो जाना अच्छा है,
अपनी ही धडकनें सुन हैरान हो जाना अच्छा है,
  यकलख्त मिल जाए यहाँ गर भीड़ में सनम
   भीड़ में गुमनाम और गुमनाम हो जाना अच्छा है   
  
तारीकियों  की गोद में सो जाना अच्छा है,
   बगैर उनके इश्क के साँसें थम जाना अच्छा है,
   ग़लतफ़हमी की आग में कभी जलने से पहले,
        "शिप्रा" का अपनी ही लहरों में फ़ना और फ़ना हो जाना अच्छा है|
 

I AM WAITING....



You didn't say good bye, while leaving
and i was standing there, crying n bleeding....
what was my mistake, my fault or sin
only dream of you,that was i dreaming???
You left me alone, absolutely forlorn
this is the day, i was always dreading ...
And I remained here, crying n bleeding..
i wanted to stop you, & call your name ,
but my voice was choked, n i was damn lame...
i couldn't follow your trail, the path you were leading 
and i m still here crying, bleeding & waiting.....
and i will be here waiting, waiting  & waiting.....

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

कहानी :अन्ना और कांग्रेस

                              एक समय की बात है, कहीं दूर एक "भारत" नाम की बगिया थी | बगिया में २८ बड़े और ७ छोटे, कुल मिलाकर ३५ पेड़-पौधे थे | बहुत सुन्दर बगिया थी वो |  हर पेड़ पर ढेर सारे घोसले थे जिनमे तरह-तरह के पक्षी रहते थे | वो सब पक्षी दिन भर मेहनत करके अपने बच्चों के लिए दाना लाते थे | सब बिलकुल सुखपूर्वक रह रहे थे |                                         एक दिन वहां "कांग्रेस" नाम का एक कुत्ता आया | वो बहुत भूखा और कमज़ोर था | उसने पक्षियों से भोजन माँगा | पक्षियों को दया आ गयी | उन्होंने उसे अपने बच्चो के लिए लाये हुए भोजन  में से कुछ  खाने को दे दिया | कुत्ता भोजन करके बहुत प्रसन्न हुआ | उसने पक्षियों से कहा, "आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद | आपने मेरा जीवन बचाया है | मुझे आप अपना एहसान चुकाने का एक अवसर दें |"
      पक्षी कुत्ते के आत्मसम्मान की भावना से बड़े प्रभावित हुए | उन्होंने कुत्ते से कहा, " तुम हमारे लिए एक काम कर सकते हो | हम सभी पक्षी पूरे दिन भोजन की तलाश में बाहर रहते है| हमारे बच्चे और अंडे यहाँ घोसलों में असुरक्षित रहते है | तुम इनकी यहाँ रहकर सुरक्षा करो, बदले में हम तुम्हे रोज़ भोजन दिया करेंगे |"
              कुत्ता ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गया | पक्षी अगले दिन से निश्चिंत होकर भोजन की खोज में जाने लगे | वे शाम को लौट कर कुत्ते को भोजन देते | सब कुछ इसी प्रकार कुछ दिनों तक चलता रहा | किन्तु एक शाम जब पक्षी वापस लौटे तो उनके घोसलों से कुछ अंडे गायब थे | पक्षियों ने कुत्ते से पूछा तो,"आज आप लोगों के जाने के सांप आया था उसने कुछ अंडे खा लिए, मुझे इस बात का अत्यंत खेद है किन्तु अब चिंता की कोई बात नहीं है | मैंने उस सांप को भगा दिया है | वह अब यहाँ आने की हिम्मत कभी नहीं करेगा |"
पक्षी कुत्ते की बहादुरी की प्रशंसा करते हुए अपने अपने घोसलों में लौट गए | लेकिन अब ऐसी  घटनाएँ रोज़ होने लगी | सारे पक्षी बहुत परेशान थे | तभी अन्ना नाम वाले बूढ़े बुद्धिमान कबूतर ने एक उपाय सुझाया | उसने कहा," हम सब लोग जब यहाँ से चले जाते हैं फिर यहाँ क्या होता है हमे नहीं पता| इसलिए अब से हम में से कोई  एक पक्षी लोकपाल बनेगा और यहाँ रह कर निगरानी करेगा | " अगले दिन से एक पक्षी रुक कर निगरानी करने लगा तो यह पाया की कांग्रेस ही उनके अण्डों को खा रहा थी | लोकपाल ने यह बात सभी पक्षियों का यह बात बताई तो वो गुस्से से कांग्रेस पर हमला करने जाने लगे | अन्ना ने उन्हें रोका और कहा," हमे यह सब शान्ति पूर्ण ढंग से करना चाहिए | हम शांति से कांग्रेस को यहाँ से जाने के लिए कहेंगे |" 
                        सारे पक्षी कांग्रेस के पास गए और अन्ना ने उसे उसके कुकृत्य के बारे में बताते हुए वहाँ से निकल जाने को कहा | हडबडाहट और भय में कांग्रेस ने अन्ना पर हमला करके उसे निगल लिया | बाकी सभी पक्षी यह देखकर गुस्से में कांग्रेस पर चोंच मारने लगे | उधर अन्ना भी पेट के अन्दर चोंच मारने लगा | कुत्ते ने अन्ना को उगलना चाहा लेकिन अन्ना जान गया था कि वह अन्दर से ज्यादा चोट पहुंचा सकता है | उसने अपने पंजे अन्दर ही गड़ा दिए और चोंच मारता रहा |  इस तरह कांग्रेस मर गया और अन्ना पेट फाड़कर बाहर आ गया |


(अब देखना यह है कि इस कांग्रेस नाम के भेड़िये का पेट कब फटता है |) 

सोमवार, 15 अगस्त 2011

कल और आज ...

चल रहे है आज भी हम यहाँ
राह भी वही रहगुजर है वही
 बस किस्मत ही बदल गयी चलते हुए
इसमें नहीं दोष रहा इन क़दमों का |


हम चले थे आज भी उसी साहिल से
नही है तो बस साथ  लहरों  का
ये  तूफाँ  ही बहा ले गया दूर उसको
 इसमें  नही दोष रहा इन  बूंदों  का |

मंजिलें थी तो आज भी  वहीँ
और टिका साहिल भी  वहीं था
कुछ साथ न था तो वो गुजरा कल
इसमें नहीं दोष  रहा इन  लहरों  का |


यहाँ के नज़ारे आज भी उतने हसीं हैं
की हर दिल यहाँ फिर से  जवाँ हो जाते हैं
ओझल हो गई तो बस अपनी खिलखिलाहट
 इसमें नहीं दोष  रहा इन  नज़रों का |

रविवार, 14 अगस्त 2011

जलन



ढूद्ती रहती है नज़रें हर घडी उनको ,
सहर से शाम तलक याद करें हम उनको | 
वो काश मेरे होते तो गम कैसा,
न मिले तो दिल पर क्या बीतेगी क्या पता उनको 


                                   सांझ की दहलीज पर  दिखा  रौशनी सा है,
                                    जाने दिल है जला या जला है दिया |
                                    जलन की आग सुलग रही है ऐसे,
                                     कितने सपने जला गई क्या पता उनको|

शनिवार, 13 अगस्त 2011

बचपन की याद.....


है सावन की बरसात याद
है बचपन की हर बात याद 
जब काले बादल होते थे 
घनघोर घटा भी बरसी थी 
उस बारिश में हम भीगे थे
उन बूंदों को भी पकडे थे
फिर कागज़ की नाव बनाकर 
बारिश में दूर बहाते थे
उस नाव के पीछे-पीछे
कुछ दूर निकल भी जाते थे
जब कीचड़ में थे पैर पड़े 
गिरते-थमते गिर जाते थे
है  सावन की बरसात याद
है बचपन की  हर बात याद

तब के दिन थे कितने अच्छे 
 सारे अपने थे कितने सच्चे 
 अब तो दुनिया भी झूटी है
  हर एक को फरेब ने लूटी है
  जब बड़े हुए तो पता चला 
  थे दुनिया से अनजान भला 
   बचपन में न चिंता थी
   अपनी न कोई निंदा थी 
  वो रात सुहानी होती थी 
  माँ की लोरी सुनती थी
  फिर नींद की रानी  आती थी 
 सपनो का महल सजाती थी 
  न ऐसी रात कभी आई 
  न नींद की रानी फिर आई
 वो  सपने अपने टूट गए   
वो सच्चे सारे छूट गए 
 बारिश वो सहसा थम गयी
बस बचा  रहा तो वही डगर 
बस बचा  रहा तो वही शहर 
वो ख़ुशी कही अब रही नही 
बस बची रही तो याद वही 
बस बची रही तो याद वही....

है बारिश  की वो बात याद
है बचपन की हर बात याद...

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

आज बारिश में......


 हमें छोड़ कर न कहीं जाओ, आज बारिश में 
थोड़ी देर और ठहर जाओ, आज बारिश में
जैसे ये बूँदें समायीं थीं बादलों में अब तक 
वैसे तुम मुझ में समां जाओ, आज बारिश में |

थाम लो हाथ मेरा, ज़रा देर मेरे संग चलो
दो कदम साथ निभाओ, आज बारिश में 

जैसे ज़मीं की प्यास बुझा दी है  बादलो ने आकर 
मेरे दिल की भी आग बुझाओ, आज बारिश में |

 जलती शबनम को होंठों से लगाने की है ख्वाहिश मेरी 
आग से आग बुझाओ , आज बारिश में 

अब लाज-ओ-हया की अदा बहुत हुयी 
सनम अब और न शरमाओ, आज बारिश में 

हमें छोड़ कर न कहीं जाओ, आज बारिश में
थोड़ी देर और ठहर जाओ, आज बारिश में |

शनिवार, 6 अगस्त 2011

प्रीत कहाँ??



कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ?

सुनते है सब रोज़ ग़ज़ल 
गीत कहाँ ? अरे गीत कहाँ ??

जलते हैं चराग अब हर घर में 
पर दीप कहाँ ?? अरे दीप कहाँ ??

छिड़ते है राग सभी दिल में 
संगीत कहाँ ?? संगीत कहाँ ??

गुलजार गुलिस्तान होता है
पर फूल यहाँ पर रोता है, 

सब जीते है दुनिया की ख़ुशी 
पर जीत कहाँ?? अरे जीत कहाँ??

मिलते है सभी दुनिया में मगर
अब मीत कहाँ?? अरे मीत कहाँ ??

कहते हैं ये है प्रेम जगत 
पर प्रीत कहाँ?? अरे ! प्रीत कहाँ ??

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

कुछ और चिल्लर.....



१. न ये धरती न वो आसमाँ चाहता हूँ... 
बस मैं तेरा करम मेहरबाँ चाहता हूँ...
तेरे पहलू में मौत की है ख्वाहिश मुझे...
मैं हूँ परवाना, मैं बस शमा चाहता हूँ ...

२. May be u don't feel like i feel
everyone has his choice 
it's not a big deal 
but do one thing
give me back my heart
i have lost this game
before u, i kneel.....

३.वो लड़की रोज़ मेरे ख़्वाबों में आ जाती है, 
सोये अरमानों को वो हर रात जगा जाती है,
उस से तन्हाई का शिकवा भी तो कर सकता नहीं 
रोज़ मिलने का वडा भी वो निभा जाती है| 
वो लड़की रोज़ मेरे ख़्वाबों में आ जाती है....

४. बड़े शौक़ से वो फिर हमें आजमाने आये,
इस बार इज़हार-ए-मोहब्बत बहाने आये 
उनका इश्क दिल्लगी से ज्यादा कुछ नहीं,
और वो मेरे इबादत से इश्क का मजाक बनाने आये |

५.अपनी बस एक गलती की सजा इतनी मिली है 
मौत से  बदतर तन्हाई की ज़िन्दगी मिली है  
अपनी धडकनें भी तो अब बेगानी लगती है 
आह की शक्ल में हमें सांस आखिरी मिली है |

६. कल नशे में मैंने यारो जाने क्या क्या कह दिया
अपने दिल को अपने ज़िस्म से जुदा कह दिया 
इश्क की मदहोशी का आलम तो देखिये
मुझ काफिर ने उन्हें इकलख्त अपना ख़ुदा कह दिया

७. मेरे दिल को कई ख्वाब वो दिखाने लगी है
मेरे ज़ेहन में अपना घर वो बनाने लगी है
वो जानती है कि अदाएं उसकी कातिल हैं मगर
फिर भी अदाएं वो हम पर आजमाने लगी है.....

८. सूनी तन्हा रातों में अकेला जागता हूँ...
जाने क्यों खुद से ही इतना भागता हूँ ....
जब सो जाती है सारी दुनिया सुकून के साथ...
तब खुद से खुद के गुनाहों की सज़ा मांगता हूँ | 

९. अपने एहसासों को भी लफ्ज़ दे देते थे 
अपने जज्बातों को शेरों में बदल देते थे 
उनसे कहने की हिम्मत कभी होती न थी 
तो वो शेर facebook पे छाप देते थे 
आज जाना, जब उनकी profile खोली 
वही शेर वो boyfriend को  forward कर देते थे ......:'

१०. फिर से कोई हमें तन्हाई का मतलब सिखा दे, कह दो ...
मेरे ख्वाबो को  को मेरी नींदों से मिटा दे, कह दो ....
नहीं जलना है मुहब्बत की आग में मुझको,
के मेरे अरमानों की आग कोई बुझा दे, कह दो.... 

११. There was a time when u were my best friend
and you were with me for my whole life...
and then here i am......in love with you.....
& losing you when you became my life

१२. कभी कभी ख़ुद को समझना भी कितना मुश्किल हो जाता है ....
तुम किसी और के हो ये जानकर के भी 
पगला है दिल, जो तुमको चाहता है...
तुमसे बात करने से तुम और अपने लगते हो 
तुमसे बात करने से सो दिल और घबराता है 
न करे गर बात हम तुमसे तब भी तो चैन नहीं आता 
जो न देखें कभी तुमको तो दिल आंसू बहाता  है .....
कभी कभी ख़ुद को समझना भी कितना मुश्किल हो जाता है ....

१३. ज़िन्दगी है नादान इसीलिए चुप हूँ,
दर्द ही दर्द सुबह शाम इसीलिए चुप हूँ,
कह दू ज़माने से दास्ताँ अपनी,
उसमे आएगा तेरा नाम इसीलिए चुप हूँ 

१४. हम उनकी ख़ामोशी से भी उनके दिल की हर बात ही पढ़ लेते है,
और वो मेरी हर बात से कहानियाँ कुछ और ही गढ़ लेते है

१५. छोड़ा न था दोस्तों ने साथ मेरा तब तलक 
जब तलक तार उनके दिल का किसी ने छेड़ा न था 

१६. तुम्हारी याद में तड़पते हम आज भी हैं 
मिलने की ख़ुशी जुदाई का ग़म आज भी है 
अब तो आता है तरस खुद पर, और इश्क पर अपने 
फिर भी जाने क्यूँ इश्क पर दिल को नाज़ आज भी है  

(बाकी फिर कभी)

सोमवार, 25 जुलाई 2011

इक जान ...



उनके हर इक बात में रहती है बस मेरी अदा | 
उनके हर इक ख्वाब में रहती है बस मेरी सदा |
लाख चाहें वो मगर, है भूलना मुमकिन नहीं |
उनके  हर इक साँस में रहती है बस मेरी दुआ |

राग छेड़े उनमे ऐसे जैसे छेड़े तार-ए-दिल |
बाँह में भर लेते मुझको जैसे दरिया को साहिल |
बोलते कि आ चलें उस पार इस दुनिया के हम |
हम भी कहते हँस के उनसे "जैसा चाहो तुम सनम" |


डर है लगता कि कहीं ये साथ न छूटे कभी |
ऐ मौला मेरे! करम मेरा ऐसे न फूटे कभी |
हो अगर ऐसा तो इक फरयाद सुन ले ऐ ख़ुदा,
 ये जिस्म गर छूटें तो हम इक जान हो जाएँ सदा |

 ये जिस्म गर छूटें तो हम इक जान हो जाएँ सदा |

ऐ खुदा...क्यूँ ???


ऐ खुदा! तेरी ये दुनिया यूँ बदलती क्यूँ है??
 जिनसे गुजरे थे कल, वो राहें फिर से न गुजरती क्यूँ हैं??
ये जो गलियाँ हैं लगाती थी बचपन में दौड़ हमसे 
आज अजनबियों सी खड़ी हमें यूँ तकती क्यूँ हैं??
ऐ खुदा....

अपनी गोदी में ले मुझको सुलाती थी जो,
पत्ते टकराकर मीठी लोरी सुनाती थी जो,
जो मेरे बालो में हाथ फेरकर सहलाती थी 
बूढ़े पीपल से वो हवा मस्त न चलती क्यूँ है |
ऐ खुदा....

वो गौरैया जो छप्पर में थी अंडे देती 
अपने बच्चों को खुद लाकर थी दाने देती 
जो जगाती थी मुझे हर सुबह चीं-चीं करके 
मेरे आँगन में वो अब न चहकती क्यूँ है ??
ऐ खुदा ....  

शनिवार, 23 जुलाई 2011

दिनचर्या

सुबह सवेरे रोज़ अँधेरे, 
उठ कर हो गया तंग |
नहीं जागना नहीं  भागना,  
चाहे जो हो दंग |

चाहे जो हो दंग,
अंग में पीड़ा होती |
न जाना होता तो, 
दिन भर क्रीडा होती |

क्रीडा होती मस्त,
गस्त करते हम दिन भर |
दिन से होती साँझ,
और हम सोते जी भर |

सोते जी भर यूँ कि,
जैसे मदिरा पी हो |
सपने में आती इक नारी ,
सुंदर सी जो |

सुंदर सी जो नार मिले, 
तो ब्याह रचाता |
नहीं छोड़ता  जीवन भर,
और साथ निभाता |

साथ निभाता इस से पहले
टुट गयी निंदिया |
घड़ी का कांटा एक तरफ, 
एक तरफ थी खटिया |

मिलन........कैसे??

दिल में जगे जज़्बात, 
दबाऊं कैसे?? 
होंठों पे आई बात,
छुपाऊँ कैसे??

हर शाम जहाँ जाता,
और रात था बिताता  
उस मय के दर-ओ-राह को 
भुलाऊँ कैसे ??
कोसा तो मैंने खूब 
ख़ुद को ख़ुदी में ख़ुद से 
पर चाह कर भी मालिक,ख़ुद को 
मिटाऊं कैसे ??

वो थी सदा-ए-जन्नत 
माँगा उसे दुआ में 
इंसान मैं, परी वो, जोड़ी
बनाऊं कैसे ??

दिल में जगे जज़्बात,
आखिर..........दबाऊं कैसे??

लोकप्रिय पोस्ट